कविता-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra

कविता-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra

काल परे कोस चलि चलि थक गए पाय

काल परे कोस चलि चलि थक गए पाय,
सुख के कसाले परे ताले परे नस के।
रोय रोय नैनन में हाले परे जाले परे,
मदन के पाले परे प्रान पर-बस के।
‘हरिचंद’ अंगहू हवाले परे रोगन के,
सोगन के भाले परे तन बल खसके।
पगन छाले परे लांघिबे को नाले परे,
तऊ लाल लाले परे रावरे दरस के।

जगत में घर की फूट बुरी

जगत में घर की फूट बुरी।
घर की फूटहिं सो बिनसाई, सुवरन लंकपुरी।
फूटहिं सो सब कौरव नासे, भारत युद्ध भयो।
जाको घाटो या भारत मैं, अबलौं नाहिं पुज्यो।
फूटहिं सो नवनंद बिनासे, गयो मगध को राज।
चंद्रगुप्त को नासन चाह्यौ, आपु नसे सहसाज।
जो जग में धनमान और बल, अपुनो राखन होय।
तो अपने घर में भूलेहु, फूट करो मति कोय॥

सखी हम काह करैं कित जायं

सखी हम काह करैं कित जायं
बिनु देखे वह मोहिनी मूरति नैना नाहिं अघायँ
बैठत उठत सयन सोवत निस चलत फिरत सब ठौर
नैनन तें वह रूप रसीलो टरत न इक पल और
सुमिरन वही ध्यान उनको हि मुख में उनको नाम
दूजी और नाहिं गति मेरी बिनु मोहन घनश्याम
सब ब्रज बरजौ परिजन खीझौ हमरे तो अति प्रान
‘हरीचन्द’ हम मगन प्रेम-रस सूझत नाहिं न आन

सखी हम बंसी क्यों न भए

सखी हम बंसी क्यों न भए।
अधर सुधा-रस निस-दिन पीवत प्रीतम रंग रए।
कबहुँक कर में, कबहुँक कटि में, कबहूँ अधर धरे।
सब ब्रज-जन-मन हरत रहति नित कुंजन माँझ खरे।
देहि बिधाता यह बर माँगों, कीजै ब्रज की धूर।
’हरीचंद’ नैनन में निबसै मोहन-रस भरपूर॥

 

मारग प्रेम को को समझै

मारग प्रेम को को समझै ‘हरिचंद’ यथारथ होत यथा है।
लाभ कछू न पुकारन में बदनाम ही होने की सारी कथा है।
जानत है जिय मेरो भला बिधि और उपाय सबै बिरथा है।
बावरे हैं ब्रज के सगरे मोहिं नाहक पूछत कौन विधा है।

 

रहैं क्यौं एक म्यान असि दोय

रहैं क्यौं एक म्यान असि दोय।
जिन नैनन मैं हरि-रस छायो, तेहि क्यौं भावै कोय।
जा तन मन मैं राहि रहै मोहन, तहाँ ग्यान क्यौं आवै।
चाहो जितनी बात प्रबोधो, ह्याँ को जो पतिआवै।
अमृत खाई अब देखि इनारुन, को मूरख जो भूलै।
‘हरिचंद’ ब्रज तो कदली-बन, काटौ तो फिरि फूलै॥

 

 हरि को धूप-दीप लै कीजै

हरि को धूप-दीप लै कीजै।
षटरस बींजन विविध भाँति के नित नित भोग धरीजै।
दही, मलाई, घी अरु माखन तापो पै लै दीजै।
’हरीचंद’ राधा-माधव-छबि, देखि बलैंया लीजै॥

 

 सुनौ सखि बाजत है मुरली

सुनौ सखि बाजत है मुरली।
जाके नेंक सुनत ही हिअ में उपजत बिरह-कली।
जड़ सम भए सकल नर, खग, मृग, लागत श्रवन भली।
’हरीचंद’ की मति रति गति सब धारत अधर छली॥

 

 बैरिनि बाँसुरी फेरि बजी

बैरिनि बाँसुरी फेरि बजी।
सुनत श्रवन मन थकित भयो अरु मति गति जाति भजी।
सात सुरन अरु तीन ग्राम सों पिय के हाथ सजी।
’हरीचंद’ औरहु सुधि मोही जबही अधर तजी॥

 

 मेरे नयना भये चकोर

मेरे नयना भये चकोर
अनुदिन निरखत श्याम चन्द्रमा सुन्दर नंदकिशोर
तनिक भये वियोग उर बाढ़त बहु बिधि नयन मरोर
होत न पल की ओट छिनकहूँ रहत सदा दृग जोर
कोऊ न इन्हें छुडावनहारों अरुझे रूप झकोर
‘हरिचन्द’ नित छके प्रेम रस जानत साँझ न भोर

ब्रज के लता पता मोहिं कीजै

ब्रज के लता पता मोहिं कीजै
गोपी पद-पंकज पावन की रज जामै सिर भीजै
आवत जात कुंज की गलियन रूप-सुधा नित पीजै
श्री राधे राधे मुख यह बर हरीचन्द को दीजै

लहौ सुख सब विधि भारतवासी

लहौ सुख सब विधि भारतवासी।
विद्या कला जगत की सीखो, तजि आलस की फाँसी।
अपने देश, धरम, कुल समझो, छोड वृत्ति निज दासी।
पंचपीर की भगति छोडि, होवहु हरिचरन उपासी।
जग के और नरन सम होऊ, येऊ होय सबै गुन रासी।

रोकहिं जौं तो अमंगल होय

रोकहिं जौं तो अमंगल होय, औ प्रेम नसै जै कहैं पिय जाइए।
जौं कहैं जाहु न तौ प्रभुता, जौ कछु न तौ सनेह नसाइए।
जौं ‘हरिचंद’ कहै तुम्हरे बिन जीहै न, तौ यह क्यों पतिआईए।
तासौं पयान समै तुम्हरे, हम का कहैं आपै हमें समझाइए।

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