कविता- भग्नदूत अज्ञेय- सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन “अज्ञेय”-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya,

कविता- भग्नदूत अज्ञेय- सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन “अज्ञेय”-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya,

मानस-मरु में व्यथा-स्रोत स्मृतियाँ ला भर-भर देता था,
वर्तमान के सूनेपन को भूत द्रवित कर देता था,
वातावलियों से ताडि़त हो लहरें भटकी फिरती थीं-
कवि के विस्तृत हृदय-क्षेत्र में नित्य हिलोरें करती थीं।

चिर-संचय से धीरे-धीरे कवि-मानस भी भर आया
किन्तु न फूट निकलने के पथ भाव-तरंगिनि ने पाया।
फिर भी कूलों से पागल-सा छलक गया वह पारावार-
‘कविता! कविता!’ कहता उस में बहा जा रहा सब संसार!

अमृतसर जेल, दिसम्बर, 1931

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