कविता-त्रिलोक सिंह ठकुरेला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Trilok Singh Thakurela Part 1

कविता-त्रिलोक सिंह ठकुरेला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Trilok Singh Thakurela Part 1

बिटिया (गीत)

बिटिया !
जरा संभल कर जाना,
लोग छिपाये रहते खंजर ।

गाँव, नगर
अब नहीं सुरक्षित
दोनों आग उगलते,
कहीं कहीं
तेज़ाब बरसता,
नाग कहीं पर पलते,
शेष नहीं अब
गंध प्रेम की,
भावों की माटी है बंजर ।

युवा वृक्ष
कांटे वाले हैं
करते हैं मनभाया,
ठूंठ हो गए
विटप पुराने
मिले न शीतल छाया,
बैरिन धूप
जलाती सपने,
कब सोचा था ऐसा मंजर ।

तोड़ चुकीं दम
कई दामिनी
भरी भीड़ के आगे,
मुन्नी, गुड़िया
हुईं लापता,
परिजन हुए अभागे,
हारी पुलिस
न वे मिल पायीं,
मिला न अब तक उनका पंजर ।

 

करघा व्यर्थ हुआ (गीत)

करघा व्यर्थ हुआ
कबीर ने बुनना छोड़ दिया ।

काशी में
नंगों का बहुमत,
अब चादर की
किसे जरूरत,
सिर धुन रहे कबीर
रूई का
धुनना छोड़ दिया ।

धुंध भरे दिन
काली रातें,
पहले जैसी
रहीं न बातें,
लोग काँच पर मोहित
मोती
चुनना छोड़ दिया ।

तन मन थका
गाँव घर जाकर,
किसे सुनायें
ढाई आखर,
लोग बुत हुए
सच्ची बातें
सुनना छोड़ दिया ।

 

हरसिंगार रखो (गीत)

मन के द्वारे पर
खुशियों के
हरसिंगार रखो.

जीवन की ऋतुएँ बदलेंगी,
दिन फिर जायेंगे,
और अचानक आतप वाले
मौसम आयेंगे,
संबंधों की
इस गठरी में
थोडा प्यार रखो.

सरल नहीं जीवन का यह पथ,
मिलकर काटेंगे,
हम अपना पाथेय और सुख, दुःख
सब बाँटेंगे,
लौटा देना प्यार
फिर कभी,
अभी उधार रखो.

 

मिलकर पढ़ें वे मंत्र (गीत)

आइये, मिलकर पढ़ें वे मंत्र ।

जो जगाएं प्यार मन में,
घोल दें खुशबू पवन में,
खुशी भर दें सर्वजन में,
कहीं भी जीवन न हो ज्यों यंत्र ।

स्वर्ग सा हर गाँव घर हो,
सम्पदा-पूरित शहर हो,
किसी को किंचित न डर हो,
हर तरह मजबूत हो हर तंत्र ।

छंद सुख के, गुनगुनायें,
स्वप्न को साकार पायें,
आइये, वह जग बनायें,
हो जहाँ सम्मानमय जनतंत्र ।

 

खुशियों के गन्धर्व (गीत)

खुशियों के गन्धर्व
द्वार द्वार नाचे ।

प्राची से
झाँक उठे
किरणों के दल,
नीड़ों में
चहक उठे
आशा के पल,

मन ने उड़ान भरी
स्वप्न हुए साँचे ।

फूल
और कलियों से
करके अनुबंध,
शीतल बयार
झूम
बाँट रही गंध,

पगलाये भ्रमरों ने
प्रेम-ग्रंथ बाँचे ।

 

देश

हरित धरती,
थिरकतीं नदियाँ,
हवा के मदभरे सन्देश ।
सिर्फ तुम भूखंड की सीमा नहीं हो देश ।।

भावनाओं, संस्कृति के प्राण हो,
जीवन कथा हो,
मनुजता के अमित सुख,
तुम अनकही अंतर्व्यथा हो,
प्रेम, करुणा,
त्याग, ममता,
गुणों से परिपूर्ण हो तपवेश ।
सिर्फ तुम भूखंड की सीमा नहीं हो देश ।।

पर्वतों की श्रंखला हो,
सुनहरी पूरव दिशा हो,
इंद्रधनुषी स्वप्न की
सुखदायिनी मधुमय निशा हो,
गंध, कलरव,
खिलखिलाहट, प्यार
एवं स्वर्ग सा परिवेश ।
सिर्फ तुम भूखंड की सीमा नहीं हो देश ।।

तुम्हीं से यह तन,
तुम्हीं से प्राण, यह जीवन,
मुझ अकिंचन पर
तुम्हारी ही कृपा का धन,
मधुरता, मधुहास,
साहस,
और जीवन -गति तुम्हीं देवेश ।
सिर्फ तुम भूखंड की सीमा नहीं हो देश ।।

 

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