कविता -घनानंद-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ghananand Collections part 9

कविता -घनानंद-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ghananand Collections part 9

दसन बसन बोली भरि ए रहे गुलाल

दसन बसन बोली भरि ए रहे गुलाल
हँसनि लसनि त्यों कपूर सरस्यौ करै ।
साँसन सुगंध सौंधे कोरिक समोय धरे,
अंग-अंग रूप-रंग रस बरस्यौ करै ।
जान प्यारी तो तन ‘अनंदघन’ हित नित,
अमित सुहाय आग फाग दरस्यौ करै ।
इतै पै नवेली लाज अरस्यौ करै, जु प्यारौ-
मन फगुवा दै, गारी हू कों तरस्यौ करै ।

जा हित मात कौं नाम जसोदा

जा हित मात कौं नाम जसोदा, सुबंस कौ चन्द्रकला -कुलधारी ।
सोभा-समूहमयी ‘घनआनन्द’ मूरति रंग अनंग जिवारि ।
जान महा सहजै रिझवार, उदार विलास सु रासबिहारी।
मेरो मनोरथ हूँ पुरवौ तुमहीं, मो मनोरथ पूरनकारी ।

लै ही रहे हो सदा मन और को दैबो न

लै ही रहे हो सदा मन और को दैबो न जानत जान दुलारे।
देख्यौं न है सपनेहू कहूं दुख त्यागो संकोच औ सोच सुखारे।
कैसो संजोग वियोग धौं आहि फिरौ घन आनंद है मतवारे।
मो गति बूझि परैं तब ही जब होहु घरीक लौ आपु ते न्यारे।

मारति मरोरै जिय डारति कहा कहौं

मारति मरोरै जिय डारति कहा कहौं।
रसना पुकारिकैं विचारी पचि हारि रहै,
कहै कैसे अकह उदेग रूधि कै मरों।
हाय कौन वेदनि विरंचि मेरे बांट कीनी
विघटित परौ न क्यों हूं, ऐसी विधि हौं भरौं।
आनंद के धन हौ सजीवन सुजान देखौं
सीरी परि सोचनि अचंमें सौं जरौं मरौं।

उर गति ब्यौरिवे कौं सुंदर सुजान जू को

उर गति ब्यौरिवे कौं सुंदर सुजान जू को,
लाख लाख विधि सों मिलन अभिलाखियै।
बातें रिस-रस भीनी कसि गति गांस झीनी,
बीनि बीनि आछी भांति पांति रवि राखिवै।
भाग जागैं जौ कहूँ बिलोकैं घन आनंद तौ,
ता छिन की छाकनि के लोचन ही साखियै।
भूलै सुधि सातौं दसा-बिबस गिरत गातौ।
रीझि बावरे दवै तब औरै कछू भाखियै।

अन्तर आँच उसास तचै अति (सवैया)

अन्तर आँच उसास तचै अति अंग उसीजै उदेग की आवस ।
ज्यौ कहलाय मसोसनि ऊमस क्यौं हूँ कहूँ सु धरै नहिं ध्यावस।
नैन उधारि हिये बरसै धनआनंद छाई अनोखिए पावस ।
जीवनमूरति जान को आनन है बिन हेरें सदाई अमावसा।

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