कविता -घनानंद-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ghananand Collections part 8

कविता -घनानंद-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ghananand Collections part 8

तब तौ छबि पीवत जीवत है (सवैया)

तब तौ छबि पीवत जीवत है अब सोचन लोचन जात जरे
हित-पोष के तोष सुप्राण पले बिललात महादुख दोष भरे।
‘घनआनन्द’ मीत सुजान बिना सबही सुखसाज समाज टरे
तब हार पहाड़ से लागत है अब आनि के बीच पहार परे।

राति-द्यौस कटक सचे ही रहे

राति-द्यौस कटक सचे ही रहे, दहै दुख
कहा कहौं गति या वियोग बजमर की ।
लियो घेरि औचक अकेली कै बिचारो जीव,
कछु न बसाति यों उपाव बलहारे की ।
जान प्यारे, लागौ न गुहार तौ जुहार करि,
जूझ कै निकसि टेक गहै पनधारे की ।
हेत-खेत धूरि चूर चूर ह्वै मिलैगी, तब
चलैंगी कहानी ‘घनआनन्द’ तिहारे की।

पीरी परी देह छीनी, राजत सनेह भीनी

पीरी परी देह छीनी, राजत सनेह भीनी,
कीनी है अनंग अंग-अंग रंग बोरी सी ।
नैन पिचकारी ज्यों चल्यौई करै रैन-दिन,
बगराए बारन फिरत झकझोरी सी ।
कहाँ लौं बखानों ‘घनआनँद’ दुहेली दसा,
फाग मयी भी जान प्यारी वह भोरी सी ।
तिहारे निहारे बिन, प्रानन करत होरा,
विरह अँगारन मगरि हिय होरी सी ।

जिय की बात जनाइये क्यों करि

जिय की बात जनाइये क्यों करि,
जान कहाय अजाननि आगौ।
तीरन मारि कै पीरन पावत,
एक सो मानत रोइबो रागौ।
ऐसी बनी ‘घनआनन्द’ आनि जु,
आनन सूझत सो किन त्यागौ।
प्रान मरेंगे भरेंगे बिथा पै,
अमोही से काहू को मोह न लागौ।

प्रेम को महोदधि अपार हेरि कै, बिचार

प्रेम को महोदधि अपार हेरि कै, बिचार,
बापुरो हहरि वार ही तैं फिरि आयौ है।
ताही एकरस ह्वै बिबस अवगाहैं दोऊ,
नेही हरि राधा, जिन्हैं देखें सरसायौ है।
ताकी कोऊ तरल तरंग-संग छूट्यौ कन,
पूरि लोक लोकनि उमगि उफ़नायौ है।
सोई घनआनँद सुजान लागि हेत होत,
एसें मथि मन पै सरूप ठहरायौ है।

खेलत खिलार गुन-आगर उदार राधा

खेलत खिलार गुन-आगर उदार राधा
नागरि छबीली फाग-राग सरसात है ।
भाग भरे भाँवते सों, औसर फव्यौ है आनि,
‘आनँद के घन’ की घमंड दरसात है ।
औचक निसंक अंक चोंप खेल धूँधरि सिहात है ।
केसू रंग ढोरि गोरे कर स्यामसुंदर कों,
गोरी स्याम रंग बीचि बूड़ि-बूड़ि जात है ।

कहाँ एतौ पानिप बिचारी पिचकारी धरै

कहाँ एतौ पानिप बिचारी पिचकारी धरै,
आँसू नदी नैनन उमँगिऐ रहति है ।
कहाँ ऐसी राँचनि हरद-केसू-केसर में,
जैसी पियराई गात पगिए रहति है ।
चाँचरि-चौपहि हू तौ औसर ही माचति, पै-
चिंता की चहल चित्त लगिऐ रहति है ।
तपनि बुझे बिन ‘आनँदघन’ जान बिन,
होरी सी हमारे हिए लगिऐ रहति है ।

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