कविता -घनानंद-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ghananand Collections part 6

कविता -घनानंद-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ghananand Collections part 6

जीवन ही जिय की सब जानत जान (सवैया)

जीवन हौ जिय की सब जानत जान, कहा कहि बात जतैये।
जो कछु है सुख संपति सौंज सु नैसिक ही हँसि दैन मैं पैये।।
आनंद के घन, लागै अचंभो पपीहा-पुकार ते क्यों अरसैये।
प्रीतिपगी आँखियानि दिखाय कै हाय अनीति सुदीठि छिपैये।।

मरिबो बिसराम गनै

मरिबो बिसराम गनै वह तो बापुरो मीट तज्यौ तरसै।
वह रूप छठा न सहारि सकै यह तेज तवै चितवै बरसे।
घनआनंद कौन अनोखी दसा मतिआवरी बावरी ह्वै थरसै।
बिछुरे-मिले मीन-पतंग-दसा खा जो जिय की गति को परसै।।

अच्छर मन कों छरै बहुरि अच्छर ही भावै

अच्छर मन कों छरै बहुरि अच्छर ही भावै।
रूप अच्छरातीत ताहि अच्छरहि बतावै।
अच्छर कौ यह भेद-कौंन जानै बिन मानै।
अच्छर हूं मैं मौन मिलै सारदा सुठानै।
अच्छर-मौन-सवाद-रस आनंद घन बरसत रहै।
तत्त्वज्ञान बौरानि में अच्छरगति अच्छर लहै।

घेरि घबरानी उबरानिही रहति घन (कवित्त)

घेरि घबरानी उबरानिही रहति घन
आनन्द आरत राती साधनि मरति हैं ।
जीवन अधार जान रूप के अधार बिन
व्याकुल बिकार भरी खरी सुजरति हैं।।
अतन जतन तें अनखि अरसानि वीर
परी पीर भीर क्योंहूँ धीर न धरति हैं।
देखिए दसा असाध अँखियां निपेटिनि की
भसमी बिथा पैं नित लंघन करति हैँ।।

रोम रोम रसना ह्वै लहै जो गिरा के गुन (कवित्त)

रोम रोम रसना ह्वै लहै जो गिरा के गुन
तऊ जान प्यारी निबरैं न मैंन आरतैं ।
ऐसें दिनदीन दीन की दया न आई दई
तोहि विष भी यो विषम विगोगसर मार तैं।।
दरस सुरस प्यास भावरे भरत रहौं
फेरिए निरास मोहिं क्यों धों यों बछार तैं।
जीवन अधार घनआनंद उदार महा
कैसें अनसुनी करी चातक पुकार तैं।।

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