कविता -घनानंद-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ghananand Collections part 5

कविता -घनानंद-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ghananand Collections part 5

चेटक रूप-रसीले सुजान

चेटक रूप-रसीले सुजान,
दर्इ बहुतै दिन नेकु दिखार्इ।
कौंध मैं चौंधमर्इ चख हाय,
कहा कहौं हेरनि ऐसे हिरार्इ।
बातैं बिलाय रर्इ रसना पै,
हियौं उमग्यौं कहि एकौन आर्इ।
सौंध कि संभ्रम हों घन आनंद।
सोचनि ही मति जाति हिरार्इ।

उर भौन में मौन को घूंघट कै

उर भौन में मौन को घूंघट कै दुरि बैठी बिराजति बात बनी।
मृदु मंजु पदारथ भूषन सों सुलसै दुलसै रस-रूप मनी।
रसना अली कान गली मधि ह्वै पधरावति लै चित सेज सनी।
घनआँनद बूझनि अंक बसै बिलसै रिझवार सुजान धनी।

अंग अंग स्याम-रस-रंग की तरंग उठै

अंग अंग स्याम-रस-रंग की तरंग उठै,
अति गहरार्इ हिय प्रेम उफनानि की।
उमगानि भरी पूर-पानिप सुढार ढारी,
मीठी धुनि करै ताप हरै अंखियानि की।
माहा छवि-नीर तीर गढ़ते न टरयौ जाय,
मोहनता निधि विधि पुहमी पै अनिकी।
भान की दुलारी घनआनंद जीवन ज्यारी,
वृंदावन-सोभा सींव सुख सरसानि की।

घननंद के प्यारे सुजान सुनौ

घननंद के प्यारे सुजान सुनौ, जेहिं भाँतिन हौं दुख-शूल सहौं
नहिं आवन औधि, न रावरि आस, इते पर एक सा बात चहौं
यह देखि अकारन मेरि दसा, कोइ बूझइ ऊतर कौन कहौं
जिय नेकु बिचारि कै देहु बताय, हहा प्रिय दूरि ते पाँय गहौं

आँखैं जो न देखैं तो कहा हैं कछु देखति ये (कवित्त)

आँखैं जो न देखैं तो कहा हैं कछु देखति ये
ऐसी दुखहाइनि की दसा आय देखिए ।
प्रानन के प्यारे जान रूप उँजियरे बिना
तिहारे मिलन इन्हैं कौन लेखे लेखिए।।
नीर न्यारे मीन औ चकोर चन्दहीन हूं तैं
अतिही अधीन दीन गति मति पेखिए ।
हौ जू घनआनंद ढरारे रसभरे मारे
चातिक बिचारे सों न चूकनि परेखिए।।

आसा गुन बाँधिकैं भरोसो सिल धरि छाती (कवित्त)

आसा गुन बाँधिकैं भरोसो सिल धरि छाती
पूरे पन सिंधु मैं न बूड़त सकायहौं।
दुख दव हिय जारि अन्तर उदेग आंच
निरन्तर रोम रोम त्रासनि तचायहौं।।
लाख लाख भांतिन की दुसह दसानि जानि
साहस सहारि सिर आरे लौं चलायहौं ।
ऐसें घनआनंद गही है टेक मन साहिं
एरे निरदई तोहिं दया उपजायहौं।।

जानराय जानत सबै (दोहा)

जानराय जानत सबै, अंतरगत की बात।
क्यों अजान लों करत फिर, मो घायल पर घात।।

Leave a Reply