कविता -घनानंद-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ghananand Collections part 3

कविता -घनानंद-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ghananand Collections part 3

बरसैं तरसैं सरसैं अरसैं न

बरसैं तरसैं सरसैं अरसैं न, कहूँ दरसैं इहि छाक छईं।
निरखैं परखैं करखैं हरखैं उपजी अभिलाषनि लाख जईं।
घनआनँद ही उनए इनि मैं बहु भाँतिनि ये उन रंग रईं।
रसमूरति स्यामहिं देखत ही सजनी अँखियाँ रसरासि भईं।

वैस की निकाई, सोई रितु सुखदायी

वैस की निकाई, सोई रितु सुखदायी, तामें –
वरुनाई उलहत मदन मैमंत है ।
अंग-अंग रंग भरे दल-फल-फूल राजैं,
सौरभ सरस मधुराई कौ न अंत है ।
मोहन मधुप क्यों न लटू ह्वै सुभाय भटू,
प्रीति कौ तिलक भाल धरै भागवंत है ।
सोभित सुजान ‘घनाआनँद’ सुहाग सींच्यौ,
तेरे तन-बन सदा बसत बसंत है ।

अरी, निसि नींद न आवै, होरी खेलन की चोप

अरी, निसि नींद न आवै, होरी खेलन की चोप ।
स्याम सलौना, रूप रिझौना, उलह्यौ जोबन कोप ।
अबहीं ख्याल रच्यौ जु परस्पर, मोहन गिरिधर भूप ।
अब बरजत मेरी सास-नँनदिया, परी विरह के कूप ।
मुरली टेर सुनाइ, जगावै सोवत मदन अनूप ।
पै जिय सोच रही हौं अपने, जाय मिलौं हरि हूप ।
इत डर लोग, उत चोंप मिलन की, निरख-निरखि वो रूप ।
‘आनँदघन’ गुलाल घुमड़न में, मिलि हौं अँग-अँग गूप ।

(राग खंभाती)

बैस नई, अनुराग मई

बैस नई, अनुराग मई, सु भई फिरै फागुन की मतवारी ।
कौंवरे हाथ रचैं मिंहदी, डफ नीकैं बजाय रहैं हियरा रीन ।
साँवरे भौंर के भाय भरी, ‘घनाआनँद’ सोनि में दीसत न्यारी ।
कान्ह है पोषत प्रान-पियें, मुख अंबुज च्वै मकरंद सी गारी ।

पकरि बस कीने री नँदलाल

पकरि बस कीने री नँदलाल ।
काजर दियौ खिलार राधिका, मुख सों मसलि गुलाल ।
चपल चलन कों अति ही अरबर, छूटि न सके प्रेम के जाल ।
सूधे किये बंक ब्रजमोहन, ‘आनँदघन’ रस-ख्याल ।

(राग केदारौ)

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