कविता -घनानंद-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ghananand Collections part 2

कविता -घनानंद-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ghananand Collections part 2

झलकै अति सुन्दर आनन गौर

झलकै अति सुन्दर आनन गौर,
छके दृग राजत काननि छ्वै।
हँसि बोलनि मैं छबि फूलन की बरषा,
उर ऊपर जाति है ह्वै।
लट लोल कपोल कलोल करैं,
कल कंठ बनी जलजावलि द्वै।
अंग अंग तरंग उठै दुति की,
परिहे मनौ रूप अबै धर च्वै।।

भए अति निठुर, मिटाय पहचानि डारी (कवित्त)

भए अति निठुर, मिटाय पहचानि डारी,
याही दुख में हमैं जक लागी हाय हाय है।
तुम तो निपट निरदई, गई भूलि सुधि,
हमैं सूल सेलनि सो क्योहूँन भुलाय है।
मीठे मीठे बोल बोलि ठगी पहिलें तौ तब,
अब जिय जारत कहौ धौ कौन न्याय है।
सुनी है कै नाहीं, यह प्रगट कहावति जू,
काहू कलपायहै सु कैसे कल पाय है।

मीत सुजान अनीत करौ जिन (सवैया)

मीत सुजान अनीत करौ जिन, हा हा न हूजियै मोहि अमोही।
डीठि कौ और कहूँ नहिं ठौर फिरी दृग रावरे रूप की दोही।
एक बिसास की टेक गहे लगि आस रहे बसि प्रान-बटोही।
हौं घनआनँद जीवनमूल दई कित प्यासनि मारत मोही।।

प्रीतम सुजान मेरे हित के निधान कहौ (कवित्त)

प्रीतम सुजान मेरे हित के निधान कहौ
कैसे रहै प्रान जौ अनखि अरसायहौ।
तुम तौ उदार दीन हीन आनि परयौ द्वार
सुनियै पुकार याहि कौ लौं तरसायहौ।
चातिक है रावरो अनोखो मोह आवरो
सुजान रूप-बावरो, बदन दरसायहौ।
बिरह नसाय, दया हिय मैं बसाय, आय
हाय ! कब आनँद को घन बरसायहौ।।

‘घनाआनँद’ जीवन मूल सुजान की (सवैया)

‘घनाआनँद’ जीवन मूल सुजान की, कौंधनि हू न कहूँ दरसैं ।
सु न जानिये धौं कित छाय रहे, दृग चातक प्रान तपै तरसैं ।
बिन पावस तो इन्हें थ्यावस हो न, सु क्यों करि ये अब सो परसैं।
बदरा बरसै रितु में घिरि कै, नितहीं अँखियाँ उघरी बरसैं ।

इन बाट परी सुधि रावरे भूलनि

इन बाट परी सुधि रावरे भूलनि,
कैसे उराहनौ दीजिए जू।
इक आस तिहारी सों जीजै सदा,
घन चातक की गति लीजिए जू।
अब तौ सब सीस चढाये लई,
जु कछु मन भाई सो कीजिये जू।
‘घनआनन्द’ जीवन -प्रान सुजान,
तिहारिये बातनि जीजिये जू।

जिन आँखिन रूप-चिन्हार भई

जिन आँखिन रूप-चिन्हार भई,
तिनको नित ही दहि जागनि है।
हित-पीरसों पूरित जो हियरा,
फिरि ताहि कहाँ कहु लागनि है।
‘घनआनन्द’ प्यारे सुजान सुनौ,
जियराहि सदा दुख दागनि है।
सुख में मुख चंद बिना निरखे,
नखते सिख लौं बिख पागनि है।

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