कविता -घनानंद-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ghananand Collections part 13

कविता -घनानंद-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ghananand Collections part 13

जहाँ तैं पधारै मेरे नैननि हों पाँव धारे (कवित्त)

जहाँ तैं पधारै मेरे नैननि हों पाँव धारे
वारै ये बिचारे प्रान पैंड़ पैंड़ पैं मनौ ।
आतुर न होई हाहा नेकु फैंट छोरि बैठो
मोहि वा बिसासी को है ब्येरो बूझिबो घनौ।।
हाय निरदई कों हमारी सुधि कैसें आई
कौन बिधि दीनी पाती दीन जानि कै भनौ।
झूठ की सचाई छाक्यो त्यों हित कचाई पाक्यो
ताके गुन गन घनआनंद कहा गनौ।।

खोय दई बुधि सोय गयी सुधि (सवैया)

खोय दई बुधि सोय गयी सुधि रोय हँसै उन्माद जग्यो है ।
भौन गहै चकि चाक रहै चलि बात कहै तन दाह दग्यो है।।
जानि परै नहि जान तुम्हें लखि ताहि कहा कछु आहि खग्यो है।
सोचनिहीं पचिए घनआनंद हेत पग्यो किधौं प्रेत लग्यो हे।।

तब ह्वै सहाय हाय कैसे धौं सुहाई ऐसी (कवित्त)

तब ह्वै सहाय हाय कैसे धौं सुहाई ऐसी
सब सुख संग लै वियोग दुख दै चले।
सींचे रस रंग अंग अंगनि अनंग सौंपि
अंतर मैं विषम विषाद बेलि बै चले।।
क्यों धौं ये निगोड़े प्रान जान घनआनंद के
गौहन न लागे जब वे करि बिजै चले।
अतिही अधीर भई पीर भीर घेरि लई
हेली मनभावन जकेली मोहिं के चले।।

चातिक चुहल चहुं ओर चाहे स्वातिही कों (कवित्त)

चातिक चुहल चहुं ओर चाहे स्वातिही कों
सूरे पन पूरे जिन्हें बिष सम अमी है ।
प्रफुलित होत भान के उदोत कंज पुंज
ता बिन बिचार निहीं जोतिजाल तमी है।।
चाहौ अनचाहौ जान प्यारे पै आनंदघन
प्रीति रीति विषम सुरोम रोम रमी है ।
मोहि तुम एक तुम्हैं मो सम अनेक आहिं
कहा कछु चन्दहिं चकोरन की कमी है।।

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