कविता -घनानंद-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ghananand Collections part 12

कविता -घनानंद-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ghananand Collections part 12

लाजनि लपेटि चितवनि भेद-भाय भरी

लाजनि लपेटि चितवनि भेद-भाय भरी
लसति ललित लोल चख तिरछानि मैं।
छबि को सदन गोरो भाल बदन, रुचिर,
रस निचुरत मीठी मृदु मुसक्यानी मैं।
दसन दमक फैलि हमें मोती माल होति,
पिय सों लड़कि प्रेम पगी बतरानि मैं।
आनँद की निधि जगमगति छबीली बाल,
अंगनि अनंग-रंग ढुरि मुरि जानि मैं।

पहिले घन-आनंद सींचि सुजान (सवैया)

पहिले घन-आनंद सींचि सुजान कहीं बतियाँ अति प्यार पगी।
अब लाय बियोग की लाय बलाय बढ़ाय, बिसास दगानि दगी।
अँखियाँ दुखियानि कुबानि परी न कहुँ लगै, कौन घरी सुलगी।
मति दौरि थकी, न लहै ठिकठौर, अमोही के मोह मिठामठगी।।

मेरोई जिव जो मारतु मोहिं तौ

मेरोई जिव जो मारतु मोहिं तौ,
प्यारे, कहा तुमसों कहनो है।
आँखिनहू यह बानि तजी,
कुछ ऐसोइ भोगनि को लहनौ है ।
आस तिहारियै ही ‘घनआनन्द’,
कैसे उदास भयो रहनौ है ।
जानि के होत इते पै अजान जो,
तौ बिन पावक ही दहनौ है।

स्याम घटा लपटी थिर बीज कि सौहै

स्याम घटा लपटी थिर बीज कि सौहै अमावस-अंक उज्यारी।
धूप के पुंज मैं ज्वाल की माल सी पै दृग-सीतलता-सुख-कारी।
कै छवि छायो सिंगार निहारि सुजान-तिया-तन-दीपति प्यारी।
कैसी फ़बी घनआनँद चोपनि सों पहिरी चुनि साँवरी सारी।

सावन आवन हेरि सखी

सावन आवन हेरि सखी,
मनभावन आवन चोप विसेखी ।
छाए कहूँ घनआनँद जान,
सम्हारि की ठौर लै भूल न लेखी ।
बूंदैं लगै, सब अंग दगै,
उलटी गति आपने पापन पेखी ।
पौन सों जागत आगि सुनी ही।
पै पानी सों लागत आँखिन देखी ।

के मदमाते आए

होरी के मदमाते आए, लागै हो मोहन मोहिं सुहाए ।
चतुर खिलारिन बस करि पाए, खेलि-खेल सब रैन जगाए ।
दृग अनुराग गुलाल भराए, अंग-अंग बहु रंग रचाए ।
अबीर-कुमकुमा केसरि लैकै, चोबा की बहु कींच मचाए ।
जिहिं जाने तिहिं पकरि नँचाए, सरबस फगुवा दै मुकराए ।
‘आनँदघन’ रस बरसि सिराए, भली करी हम ही पै छाए ।

(राग रामकली)

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