कविता -घनानंद-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ghananand Collections part 11

कविता -घनानंद-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ghananand Collections part 11

राधा नवेली सहेली समाज में

राधा नवेली सहेली समाज में, होरी कौ साज सजें अतो सोहै ।
मोहन छैल खिलार तहाँ रस-प्यास भरी अँखियान सों जोहै ।
डीठि मिलें, मुरि पीठि दई, हिय-हेत की बात सकै कहि कोहै ।
सैनन ही बरस्यौ ‘घनआनँद’, भीजनि पै रँग-रीझनि मोहै ।

धुनि पुरि रहै नित काननि में

धुनि पुरि रहै नित काननि में, अज कों उपराजिबोई सी करै ।
मन मोहन गोहन जोहन के, अभिलाख समाजिबोई सी करै ।
‘घनआनन्द’ तिखिये ताननि सों, सर से सुर साजिबोई सी करै ।
कित तें यह बैरिन बांसुरिया, बिन बाजेई बाजिबोई सी करे ।

हिय में जु आरति सु जारति उजारति है

हिय में जु आरति सु जारति उजारति है,
मारत मरोरे जियं डारति कहा करौं।
रसना पुकारि कै विचारी पचि हारि रहै,
कहै कैसे अकह, उदेग रुधि कैं मरौ।
हाय कौंन वेदनि विरंचि मेरे बांट कीनी,
विघटि परों न क्यों हू, ऐसी विधि हौं गरौं।
आनंद के घन हौ सजीवन सुजान देखौ,
सीरी परि सोचनि, अचंभे सों जरों मरों।

ढिग बैठे हू पैठि रहै उर में

ढिग बैठे हू पैठि रहै उर में धर कै खरकै दुख दोहतु है।
दृग आगे ते बैरी कहूं न टरै जग-जोहनि अंतर जोहतु है।
घन आनंद, मीत सुजान मिलें बसि बीच तऊ मति मोहतु है।
यह कैसो संजोग न बूझि परै जु वियोग न क्यों हू विछोहतु है।

तरसि-तरसि प्रान जानमनि दरस कों

तरसि-तरसि प्रान जानमनि दरस कों
उमहि-उमहि आनि आंखिन बसत हैं।
विषम विरह के विसिष हियें घायल हवै,
गहवर घूमि-घूमि सोचनि ससत हैं।
निसदिन लालसा लपेटे ही रहत लोभी,
मुरझि अनौखी उनझनि में गसत हैं।
सुमिर-सुमिरि घन आनंद मिलन सुख,
कटनि सों आसा-पट कटि लै कसत हैं।

आसही अकास मधि अवधि गुनै बढ़ाय (कवित्त)

आसही अकास मधि अवधि गुनै बढ़ाय
चोपनि चढ़ाय दीनौ कीनो खेल सो यहै।
निपट कठोर एहौ ऐंचत न आप ओर
लाड़ले सुजान सौं दुहेली दसा को कहै।।
अचिरजमई मोहि भई घनआनंद यों
हाथ साथ लाग्यो पै समीप न कहूँ लहै।
बिरह समीर की झकोरनि अधीर नेह
नीर भीज्यो जीव तऊ गुड़ी लों उड्यो रहै।।

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