कविता -घनानंद-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ghananand Collections part 10

कविता -घनानंद-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ghananand Collections part 10

परकारज देह को धारे फिरौ परजन्य

परकारज देह को धारे फिरौ परजन्य!
जथारथ ह्वै दरसौ।
निधि नीर सुधा के समान करौ,
सबही बिधि सुंदरता सरसौ
घनआनंद जीवनदायक हो,
कबौं मेरियौ पीर हिये परसौ।
कबहूँ वा बिसासी सुजान के ऑंगन में
अंसुवान को लै बरसौ

छवि को सदन मोद मंडित बदन-चंद

छवि को सदन मोद मंडित बदन-चंद
तृषित चषनि लाल, कबधौ दिखाय हौ।
चटकीलौ भेष करें मटकीली भाँति सौही
मुरली अधर धरे लटकत आय हौ।
लोचन ढुराय कछु मृदु मुसिक्याय, नेह
भीनी बतियानी लड़काय बतराय हौ।
बिरह जरत जिय जानि, आनि प्रान प्यारे,
कृपानिधि, आनंद को धन बरसाय हौ।

भोर तें साँझ लों कानन ओर निहारति (सवैया)

भोर तें साँझ लों कानन ओर निहारति बावरी नैकु न हारति।
साँझ तें भोर लों तारनि ताकिबो तारनि सों इकतार न टारति।
जौ कहूँ भावतो दीठि परै घनआनँद आँसुनि औसर गारति।
मोहन सोहन जोहन की लगियै रहै आँखिन के उर आरति।।

पहिले अपनाय सुजान सनेह सों क्यों (सवैया)

पहिले अपनाय सुजान सनेह सों क्यों फिरि तेहिकै तोरियै जू।
निरधार अधार है झार मंझार दई, गहि बाँह न बोरिये जू ।
‘घनआनन्द’ अपने चातक कों गुन बाँधिकै मोह न छोरियै जू ।
रसप्याय कै ज्याय, बढाए कै प्यास, बिसास मैं यों बिस धोरियै जू।

सौंधे की बास उसासहिं रोकत

सौंधे की बास उसासहिं रोकत, चंदन दाहक गाहक जी कौ ।
नैनन बैरी सो है री गुलाल, अधीर उड़ावत धीरज ही कौ ।
राग-विराग, धमार त्यों धार-सी लौट परयौ ढँग यों सब ही कौ ।
रंग रचावन जान बिना, ‘घनआनँद’ लागत फागुन फीकौ ।

पिय के अनुराग सुहाग भरी

पिय के अनुराग सुहाग भरी, रति हेरौ न पावत रूप रफै ।
रिझवारि महा रसरासि खिलार, सुगावत गारि बजाय डफै ।
अति ही सुकुमार उरोजन भार, भर मधुरी ड्ग, लंक लफै ।
लपटै ‘घनआनँद’ घायल ह्वैं, दग पागल छवै गुजरी गुलफै ।

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