कविता-आचार्य संजीव सलिल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Acharya Sanjeev Salil Part 2

कविता-आचार्य संजीव सलिल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Acharya Sanjeev Salil Part 2

भाषा तो प्रवहित सलिला है

भाषा तो प्रवहित सलिला है
आओ! तट पर, अवगाहो या करो आचमन

जीव सभ्यता ने ध्वनियों को
जब पहचाना
चेतनता ने भाव प्रगट कर
जुड़ना जाना

भावों ने हरकर अभाव हर
सचमुच माना-
मिलने-जुलने से नव
रचना करना ठाना

ध्वनि-अंकन हित अक्षर आये
शब्द बनाये, मानव ने नित कर नव चिंतन.
भाषा तो प्रवहित सलिला है
आओ! तट पर,
अवगाहो या करो आचमन

सलिला की कल कल कल
सुनकर मन हर्षाया
साँय-साँय सुन पवन
झकोरों की उठ धाया

चमक दामिनी की जब देखी,
तब भय खाया,
संगी पा, अपनी-उसकी
कह-सुन हर्षाया

हुआ अचंभित, विस्मित, चिंतित,
कभी प्रफुल्लित और कभी उन्मन अभिव्यंजन
भाषा तो प्रवहित सलिला है
आओ! तट पर,
अवगाहो या करो आचमन

कितने पकडे, कितने छूटे
शब्द कहाँ-कब?
कितने सिरजे, कितने लूटे
भाव बता रब

अपना कौन?, पराया
किसको कहो कहें अब?
आये-गए कहाँ से कितने
जो बोलें लब

थाती, परिपाटी, परंपरा
कुछ भी बोलो पर पालो सबसे अपनापन.
भाषा तो प्रवहित सलिला है
आओ! तट पर,
अवगाहो या करो आचमन

माँ को अर्पित चौपदे

बारिश में आँचल को छतरी, बना बचाती थी मुझको माँ
जाड़े में दुबका गोदी में, मुझे सुलाती थी गाकर माँ
गर्मी में आँचल का पंखा, झलती कहती नयी कहानी-
मेरी गलती छिपा पिता से, बिसराती थी मुस्काकर माँ

मंजन स्नान आरती थी माँ, ब्यारी दूध कलेवा थी माँ
खेल-कूद शाला नटखटपन, पर्व मिठाई मेवा थी माँ
व्रत-उपवास दिवाली-होली, चौक अल्पना राँगोली भी-
संकट में घर भर की हिम्मत, दीन-दुखी की सेवा थी माँ

खाने की थाली में पानी, जैसे सबमें रहती थी माँ
कभी न बारिश की नदिया सी कूल तोड़कर बहती थी माँ
आने-जाने को हरि इच्छा मान, सहज अपना लेती थी-
सुख-दुःख धूप-छाँव दे-लेकर, हर दिन हँसती रहती थी माँ

गृह मंदिर की अगरु-धूप थी, भजन प्रार्थना कीर्तन थी माँ
वही द्वार थी, वातायन थी, कमरा परछी आँगन थी माँ
चौका बासन झाड़ू पोंछा, कैसे बतलाऊँ क्या-क्या थी?-
शारद-रमा-शक्ति थी भू पर, हम सबका जीवन धन थी माँ

कविता दोहा गीत गजल थी, रात्रि-जागरण चैया थी माँ
हाथों की राखी बहिना थी, सुलह-लड़ाई भैया थी माँ
रूठे मन की मान-मनौअल, कभी पिता का अनुशासन थी-
‘सलिल’-लहर थी, कमल-भँवर थी, चप्पू छैंया नैया थी माँ

प्रकृति के दोहे

ले वानस्पतिक औषधि, रहिये सदा प्रसन्न।
जड़ी-बूटियों की फसल, करती धन-संपन्न।।

पादप-औषध के बिना, जीवन रुग्ण-विपन्न।
दूर प्रकृति से यदि ‘सलिल’, लगे मौत आसन्न।।

पाल केंचुआ बना ले, उत्तम जैविक खाद।
हरी-भरी वसुधा रहे, भूले मनुज विषाद।।

सेवन ईसबगोल का, करे कब्ज़ को दूर।
नित्य परत जल पीजिये, चेहरे पर हो नूर।।

अजवाइन से दूर हो, उदर शूल, कृमि-पित्त।
मिटता वायु-विकार भी, खुश रहता है चित्त।।

ब्राम्ही तुलसी पिचौली, लौंग नीम जासौन।
जहाँ रहें आरोग्य दें, मिटता रोग न कौन?

मधुमक्खी पालें ‘सलिल’, है उत्तम उद्योग।
शहद मिटाता व्याधियाँ, करता बदन निरोग।।

सदा सुहागन मोहती, मन फूलों से मीत।
हर कैंसर मधुमेह को, कहे गाइए गीत।।

कस्तूरी भिन्डी फले, चहके लैमनग्रास।
अदरक हल्दी धतूरा, लाये समृद्धि पास।।

बंजर भी फूले-फले, दें यदि बर्मी खाद।
पाल केंचुए, धन कमा, हों किसान आबाद।।

भवन कहता घर ‘सलिल’, पौधें हों दो-चार।
नीम आँवला बेल संग, अमलतास कचनार।।

मधुमक्खी काटे अगर, चुभे डंक दे पीर।
गेंदा की पाती मलें, धरकर मन में धीर।।

पथरचटा का रस पियें, पथरी से हो मुक्ति।
‘सलिल’ आजमा देखिये, अद्भुत है यह युक्ति।।

घमरा-रस सिर पर मलें, उगें-घनें हों केश।
गंजापन भी दूर हो, मन में रहे न क्लेश।।

प्रकृति-पुत्र बनकर ‘सलिल’, पायें-दें आनंद।
श्वास-श्वास मधुमास हो, पल-पल गायें छंद।।

चूहा झाँक रहा हाँडी में

चूहा झाँक रहा
हाँडी में, लेकिन पाई सिर्फ हताशा

मेहनतकश के हाथ हमेशा
रहते हैं क्यों खाली-खाली
मोटी तोंदों के महलों में
क्यों बसंत लाता खुशहाली

ऊँची कुर्सीवाले
पाते अपने मुँह में सदा बताशा

भरी तिजोरी फिर भी भूखे
वैभवशाली आश्रमवाले
मुँह में राम बगल में छूरी
धवल वसन अंतर्मन काले

करा रहा या
‘सलिल’ कर रहा ऊपरवाला मुफ्त तमाशा

अँधियारे से सूरज उगता
सूरज दे जाता अँधियारा
गीत बुन रहे हैं सन्नाटा,
सन्नाटा हँस गीत गुँजाता

ऊँच-नीच में
पलता नाता तोल तराजू तोला-माशा

शहर में मुखिया आए

शहनाई बज रही
शहर में मुखिया आए

जन-गण को कर दूर निकट नेता-अधिकारी
इन्हें बनायें सूर छिपाकर कमियाँ सारी
सबकी कोशिश करे मजूरी
भूखी सुखिया
फिर भी गाये

है सच का आभास कर रहे वादे झूठे
करते यही प्रयास वोट जन गण से लूटें
लोकतंत्र की लख मजबूरी,
लोभतंत्र
दुखिया पछताये

आए-गये अखबार रँगे, रेला-रैली में
शामिल थे बटमार कर्म-चादर मैली में
अंधे देखें, बहरे सुन,
गूँगे बोलें
हम चुप रह जाएँ

पूनम से आमंत्रण

पूनम से आमंत्रण पाकर,
ज़रा-ज़र्रा बना सितारा…

पैर थक रहे
तो थकने दो.
कदम रुक रहे
तो रुकने दो.
कभी हौसला
मत चुकने दो.
गिर-उठ-बढ़
ऊपर उठने दो.
एक दिवस देखे प्रयास यह
हर मंजिल ने विहँस दुलारा…

जितनी वक़्त
परीक्षा लेगा।
उतनी हमको
शिक्षा देगा।
नेता आकर
भिक्षा लेगा।
आम नागरिक
दीक्षा देगा.
देखेगा गणतंत्र हमारा।
सकल जगत ने उसे दुलारा…

असुर और सुर
यहीं लड़े थे।
कौरव-पांडव
यहीं अडे थे.
आतंकी मृत
यहीं पड़े थे.
दुश्मन के शव
यहीं गडे थे।
जिसने शिव को अंगीकारा।
उसी शिवा ने रिपुदल मारा…

हाइकु गजल-आया वसंत कविता-आचार्य संजीव सलिल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Acharya Sanjeev Salil Part

 

आया वसंत, / इन्द्रधनुषी हुए / दिशा-दिगंत
शोभा अनंत / हुए मोहित, सुर / मानव संत

प्रीत के गीत / गुनगुनाती धूप / बनालो मीत
जलाते दिए / एक-दूजे के लिए / कामिनी-कंत

पीताभी पर्ण / संभावित जननी / जैसे विवर्ण
हो हरियाली / मिलेगी खुशहाली / होगे श्रीमंत

चूमता कली / मधुकर गुंजार / लजाती लली
सूरज हुआ / उषा पर निसार / लाली अनंत

प्रीत की रीत / जानकार न जाने / नीत-अनीत
क्यों कन्यादान? / ‘सलिल’ वरदान / दें एकदंत

 

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