कविताएँ-गुरू गोबिन्द सिंह जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Gobind Singh Ji 1

कविताएँ-गुरू गोबिन्द सिंह जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Gobind Singh Ji 1

सेव करी इन ही की भावत

सेव करी इन ही की भावत अउर की सेव सुहात न जीको ॥
दान दयो इन ही को भलो अरु आन को दान न लागत नीको ॥
आगै फलै इन ही को दयो जग मै जसु अउर दयो सभ फीको ॥
मो ग्रहि मै मन ते तन ते सिर लउ धन है सभ ही इन ही को ॥३॥

 कहा भयो जो दोउ लोचन मूंद कै

कहा भयो जो दोउ लोचन मूंद कै बैठि रहिओ बक धिआन लगाइओ ॥
न्हात फिरिओ लीए सात समुद्रनि लोक गयो परलोक गवाइओ ॥
बास कीओ बिखिआन सो बैठ कै ऐसे ही ऐसे सु बैस बिताइओ ॥
साचु कहों सुन लेहु सभै जिन प्रेम कीओ तिन ही प्रभ पाइओ ॥९॥२९॥

 काहू लै पाहन पूज धरयो सिर

काहू लै पाहन पूज धरयो सिर काहू लै लिंग गरे लटकाइओ ॥
काहू लखिओ हरि अवाची दिसा महि काहू पछाह को सीसु निवाइओ ॥
कोउ बुतान को पूजत है पसु कोउ म्रितान को पूजन धाइओ ॥
कूर क्रिआ उरिझओ सभ ही जग स्री भगवान को भेदु न पाइओ ॥१०॥३०॥

 नाचत फिरत मोर बादर करत घोर

नाचत फिरत मोर बादर करत घोर दामनी अनेक भाउ करिओ ई करत है ॥
चंद्रमा ते सीतल न सूरज ते तपत तेज इंद्र सो न राजा भव भूम को भरत है ॥
सिव से तपसी आदि ब्रहमा से न बेदचारी सनत कुमार सी तप्सिआ न अनत है ॥
गिआन के बिहीन काल फास के अधीन सदा जुगन की चउकरी फिराए ई फिरत है ॥६॥७६॥

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