कविताएँ-गुरू गोबिन्द सिंह जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Gobind Singh Ji 4

कविताएँ-गुरू गोबिन्द सिंह जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Gobind Singh Ji  4

नारद से चतुरानन से

नारद से चतुरानन से रुमनारिख से सभ हूं मिलि गाइओ ॥
बेद कतेब न भेद लखिओ सभ हार परे हरि हाथ न आइओ ॥
पाइ सकै नही पार उमापित सि्ध सनाथ सनंतन धिआइओ ॥
धिआन धरो तिह को मन मैं जिह को अमितोजि सभै जगु छाइओ ॥८॥२५०॥

 बेद पुरान कतेब कुरान

बेद पुरान कतेब कुरान अभेद न्रिपान सभै पच हारे ॥
भेद न पाइ सकिओ अनभेद को खेदत है अनछेद पुकारे ॥
राग न रूप न रेख न रंग न साक न सोग न संगि तिहारे ॥
आदि अनादि अगाध अभेख अद्वैख जपिओ तिन ही कुल तारे ॥९॥२५१॥

तीरथ कोट कीए इसनान

तीरथ कोट कीए इसनान दीए बहु दान महा ब्रत धारे ॥
देस फिरिओ कर भेस तपोधन केस धरे न मिलै हरि पिआरे ॥
आसन कोट करे असटांग धरे बहु निआस करे मुख कारे ॥
दीन दइआल अकाल भजे बिनु अंत को अंत के धाम सिधारे ॥१०॥२५२॥

अत्र के चल्या छित छत्र के ध्रया

अत्र के चल्या छित छत्र के ध्रया छत्र धारीओं के छल्या महा सत्रन के साल हैं ॥
दान के दिवया महा मान के बढया अवसान के दिवया हैं कटया जाम जाल हैं ॥
जु्ध के जितया औ बिरु्ध के मिटया महां बु्धि के दिवया महां मानहूं के मान हैं ॥
गिआन हूं के गिआता महां बुधिता के दाता देव काल हूं के काल महा काल हूं के काल हैं ॥१॥२५३॥

पूरबी न पार पावैं

पूरबी न पार पावैं हिंगुला हिमालै धिआवैं गोरि गरदेजी गुन गावैं तेरे नाम हैं ॥
जोगी जोग साधै पउन साधना कितेक बाधै आरब के आरबी अराधैं तेरे नाम हैं ॥
फरा के फिरंगी मानैं कंधारी कुरैसी जानैं पछम के प्छमी पछानैं निज काम हैं ॥
मरहटा मघेले तेरी मन सों तपसिआ करै द्रिड़वै तिलंगी पहचानै धरम धाम हैं ॥२॥२५५॥

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