कविताएँ-गुरू गोबिन्द सिंह जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Gobind Singh Ji 3

कविताएँ-गुरू गोबिन्द सिंह जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Gobind Singh Ji 3

दाहत है दुख दोखन कौ

दाहत है दुख दोखन कौ दल दु्जन के पल मै दल डारै ॥
खंड अखंड प्रचंड प्रहारन पूरन प्रेम की प्रीत स्मभारै ॥
पार न पाइ सकै पदमापति बेद कतेब अभेद उचारै ॥
रोजी ही राज बिलोकत राजक रोख रूहान की रोजी न टारै ॥२॥२४४॥

कीट पतंग कुरंग भुजंगम

कीट पतंग कुरंग भुजंगम भूत भवि्ख भवान बनाए ॥
देव अदेव खपे अहमेव न भेव लखिओ भ्रम सिओ भरमाए ॥
बेद पुरान कतेब कुरान हसेब थके कर हाथि न आए ॥
पूरन प्रेम प्रभाउ बिना पति सिउ किन स्री पदमापति पाए ॥३॥२४५॥

 आदि अनंत अगाध अद्वैख

आदि अनंत अगाध अद्वैख सु भूत भवि्ख भवान अभै है ॥
अंति बिहीन अनातम आप अदाग अदोख अछि्द्र अछै है ॥
लोगन के करता हरता जल मै थल मै भरता प्रभ वै है ॥
दीन दइआल दइआ कर स्रीपति सुंदर स्री पदमापति ए है ॥४॥२४६॥

 काम न क्रोध न लोभ न

काम न क्रोध न लोभ न मोह न रोग न सोग न भोग न भै है ॥
देह बिहीन सनेह सभो तन नेह बिरकत अगेह अछै है ॥
जान को देत अजान को देत जमीन को देत जमान को दै है ॥
काहे को डोलत है तुमरी सुध सुंदर स्री पदमापति लैहै ॥५॥२४७॥

 रोगन ते अर सोगन ते

रोगन ते अर सोगन ते जल जोगन ते बहु भांति बचावै ॥
स्त्रु अनेक चलावत घाव तऊ तन एक न लागन पावै ॥
राखत है अपनो कर दै कर पाप स्मबूह न भेटन पावै ॥
और की बात कहा कह तो सौं सु पेट ही के पट बीच बचावै ॥६॥२४८॥

ज्छ भुजंग सु दानव देव

ज्छ भुजंग सु दानव देव अभेव तुमै सभ ही कर धिआवै ॥
भूमि अकास पताल रसातल ज्छ भुजंग सभै सिर निआवै ॥
पाइ सकै नही पार प्रभा हू को नेत ही नेतह बेद बतावै ॥
खोज थके सभ ही खुजीआ सुर हार परे हरि हाथ न आवै ॥७॥२४९॥

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