कल फिर आना इस टीले पर-शंकर लाल द्विवेदी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankar Lal Dwivedi 

कल फिर आना इस टीले पर-शंकर लाल द्विवेदी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankar Lal Dwivedi

 

जाने क्यों व्याकुल हुआ हृदय, भर आया आँखों में पानी?
किसने अँगुली सी धर दी, जो थम गई अधर पर ही बानी?

झुकते ही क्यों झर-झर बरसे,
पलकों में संध्या-सी फूली।
किसकी छवि ने हँस कर घिरते,
अँधियारे की छाया छू ली?
किसके रंग में अनुरंजित हो, अपनी धुन भूल गए, ध्यानी!
तुझ पर करने के लिए कृपा, यह किस का रूप बना दानी?

तू किसके सीने में सिमटा?
किसकी बाँहों का आलिंगन?
प्राणों को बेसुध सा करता,
माथे का प्यार भरा चुम्बन?
अलकें सुलझाने में उलझीं, अँगुलियाँ शिथिल किसकी? मानी!
तुझ को चुप करते-करते ही, भीगा किसका आँचल धानी?

तू किसकी गोदी में सोया?
यह कौन रात भर जो जागा?
किसने दे कर जीवन अपना,
प्रभु से तेरा मंगल माँगा?
किन पुण्यों के प्रतिफल ये क्षण, यह सपना सच जैसा? ज्ञानी!
खुलते ही आँख, छलेगी जो, वह पीड़ा किसने पहचानी?

तू कब तक बैठेगा यों ही?
चल उठ, अब रात हुई गहरी।
वह देख- उधर चौराहे पर,
चहका पंचम स्वर में प्रहरी।।
धरते ही पाँव, लगा कहने, ख़ामोश चन्द्र-बिंबित पानी,
कल फिर आना इस टीले पर, अपना ही भोग भरे प्रानी!।।

-31 दिसंबर, 1979

 

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