कल और आज-बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Basudev Agarwal Naman

कल और आज-बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Basudev Agarwal Naman

 

(आँसू छंद)

भारत तू कहलाता था, सोने की चिड़िया जग में।
तुझको दे पद जग-गुरु का, सब पड़ते तेरे पग में।
बल पे विपुल ज्ञान के ही, जग पर शासन फैलाया।
कितनों को इस संपद से, तूने जीना सिखलाया।।1।।

तेरी पावन वसुधा पर, नर-रत्न अनेक खिले थे।
बल, विक्रम और दया के, जिनको गुण खूब मिले थे।
अपनी अमृत-वाणी से, जग मानस को लहराया।
उनने धर्म आचरण से, था दया केतु फहराया।।2।।

समता की वीणा-धुन से, मानस लहरी गूँजाई।
जग के सब वन उपवन में, करुणा की लता सजाई।
अपने पावन इन गुण से, तू जग का गुरु कहलाया।
रँग एक वर्ण में सब को, अपना सम्मान बढ़ाया।।3।।

पर आज तुने हे भारत, वह गौरव भुला दिया है।
वह भूल अतीत सुहाना, धारण नव-वेश किया है।
तेरे दीपक की लौ में, जिनके थे मिटे अँधेरे।
तुझको सिखा रहें हैं वे, बन कर अब अग्रज तेरे।।4।।

तूने ही सब से पहले, उनको उपदेश दिया था।
जग का ज्ञान-भानु बन कर, सब का तम दूर किया था।
वह मान बड़ाई तूने, अपने मन से बिसरा दी।
वह छवि अतीत की पावन, उर से ही आज मिटा दी।।5।।

तेरे प्रकाश में जग का, था आलोकित हृदयांगन।
तूने ही तो सिखलाया, जग-जन को वह ज्ञानांकन।
वह दिव्य जगद्गुरु का पद, तू पूरा भूल गया है।
सब ओर तुझे अब केवल, दिखता सब नया नया है।।6।।

जग-जन कृपा दृष्टि के जो, आकांक्षी कभी तुम्हारी।
अपना आँचल फैलाये, बन कर जो दीन भिखारी।
उनकी कृपा दृष्टि की अब, तू मन में रखता आशा।
क्या भान नहीं है इसका, कैसे पलटा यह पासा।।7।।

बिसराये तूने अपने, सब रिवाज, खाना, पीना।
भूषा और वेश भूला, छोड़ा रिश्तों में जीना।
अपनी जाति, वर्ण, कुल का, मन में भान नहीं अब है।
तूने रंग विदेशी ही, ठाना अपनाना सब है।।8।।

कण कण में व्याप्त हुई है, तेरे भीषण कृत्रिमता।
केवल आज विदेशी की, तुझ में दिखती व्यापकता।
जाती दृष्टि जिधर को अब, हैं रंग नये ही दिखते।
नव रंग रूप ये तेरी, हैं भाग्य-रेख को लिखते।।9।।

(आँसू छंद विधान: 14 – 14 मात्रा (चरण में कुल 28 मात्रा। दो दो चरण सम तुकांत) मात्रा बाँट:- 2 – 8 – 2 – 2 प्रति यति में। मानव छंद में किंचित परिवर्तन कर प्रसाद जी ने पूरा ‘आँसू’ खंड काव्य इस छंद में रचा है, इसलिए इस छंद का नाम ही आँसू छंद प्रचलित हो गया है।)

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