कल-आवाज़ों के घेरे -दुष्यंत कुमार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dushyant Kumar

कल-आवाज़ों के घेरे -दुष्यंत कुमार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dushyant Kumar

कल : अपनी इन बिद्ध नसों में डोल रहा है
संवेदन में पिघला सीसा घोल रहा है
हाहाकार-हीन अधरों की बेचैनी में बोल रहा है
हर आँसू में छलक रहा है ! !

ये अक्षर-अक्षर कर जुड़ने वाले स्वर
ये हकला-हकलाकर आने वाली लय
पगला गये गायकों-जैसे गीत
बेवफ़ा लड़की-सी कविताएँ
ये चाहे कितनी अपूर्ण अभिव्यक्ति
समय की हों,
पर इनमें कल झलक रहा है ! !

कल :
जिसमें हम नहीं जी रहे
देख रहे हैं,
कल :
जिसको बस सुना-सुना है
देख रहे हैं : …
बाज़ारों में लुटे-लुटे-से
चौराहों पर सहमे-सहमे
आसमान में फैले-फैले
घर में डरे-डरे दुबके-से…।

चारों बोर बिछा है अपनी पीड़ाओं का पाश
दिशा-दिशा में भटके चाहे
किन्तु भविष्य-विहग उलझकर
आ जायेगा पास !

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