कला और बूढ़ा चाँद -सुमित्रानंदन पंत -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sumitranandan Pant Part 2

कला और बूढ़ा चाँद -सुमित्रानंदन पंत -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sumitranandan Pant Part 2

बूढ़ा चाँद

बूढ़ा चांद
कला की गोरी बाहों में
क्षण भर सोया है ।

यह अमृत कला है
शोभा असि,
वह बूढ़ा प्रहरी
प्रेम की ढाल ।

हाथी दांत की
स्‍वप्‍नों की मीनार
सुलभ नहीं,-
न सही ।
ओ बाहरी

खोखली समते,
नाग दंतों
विष दंतों की खेती
मत उगा।

राख की ढेरी से ढंका
अंगार सा
बूढ़ा चांद
कला के विछोह में
म्‍लान था,
नये अधरों का अमृत पीकर
अमर हो गया।

पतझर की ठूंठी टहनी में
कुहासों के नीड़ में
कला की कृश बांहों में झूलता
पुराना चांद ही
नूतन आशा
समग्र प्रकाश है।

वही कला,
राका शशि,-
वही बूढ़ा चांद,
छाया शशि है।

 कला

कला ओ पारगामी
गर्जन मौन
शुभ्र ज्ञान घन,

अगम नील की चिन्ता में
मत घुल ।

यह रूप कला ही
प्रेम कला
अमरों का गवाक्ष है ।-

उस पार की उयोति से
तेरा अंतर
दीपित कर देगी ।
तेरी आत्म रिक्तता
अक्षय वैभव से
भर जाएगी ।

ओ शरद अभ्र
तूने अपने मुक्त पंखों से
आंसू का मुक्ता भार
आकांक्षा का गहरा
श्यामल रंग
धरती पर बरसा कर
उसे हरी भरी कर दिया ।

तेरा व्यथा धुला
नग्र मन

व्यापक प्रकाश वहन करेगा,
शाश्वत मुख का दर्पण बनेगा ।

तेरे द्रवित हृदय में
स्वर्ग
स्वजनों का इंद्रधनु नीड़
बसाएगा ।

जिनकी कला ही सत्य और सुंदर है ।

देहमान

उत्तर दिशा को
अकेले न जाना
लाड़िली,
वहाँ
गंधर्व किन्नर रहते हैं ।

चाँदनी की मोहित खोहों में
ओसों के
दर्पण-से सरोवर हैं,
द्वार पर
झीने कुहासों के परदे पडे हैं ।

उत्तर दिशा में
अपनी वीणा न ले जाना
बावरी,
वहाँ अप्सर रहते हैं ।

वे मन के तारों में
ऐसे बोल छेड़ते हैं,…
देह लाज छूट जाती है ।
प्राणों की गुहाएं
आनंद निर्झरों से
गूँज उठती हैं ।

उत्तर दिशा में
ग्यारह तारों की
भाव वीणा न बजाना
मानिनी,
वहाँ इंद्र रहते हैं ।

रक्त पदम-से
ह्रदय पात्र में
शची
स्वर्णिम मधु ढालती है,-
स्वप्नों के मद से
इंद्रियों की नींद
उचट जाती है ।

वहाँ आलोक की भूलभुलैया में
अंधकार
खो जाता है ।

उत्तर दिशा को
ज्ञान शिखर की
अनंत चकाचौध में
देह मान लेकर
अकेले न जाना,
भामिनी,
वहाँ कोई नहीं,
कोई नहीं है ।

खोज

सांझ के धुंधलके में
धीमी धीमी
टिनटिनाती घंटियों की ध्वनि
किन अनजान चरागाहों से
आ रहीं है ।

भेड़ों के झुंड-सी
अवचेतन की
घाटियों में छिपी
परंपराओं को
संस्कार
अपने अभ्यास की
पैतृक लाठी से
हाँक रहे हैं ।

धरती के जघनों के बीच
फैली
घाटियों के अंग
कुम्हलाने लगे हैं ।
नाभि-से गहरे
पोखर के जल में
अंधियाला डूब रहा है ।

शिखरों पर से
चीलों के पंख खोल
अंतिम सुनहली किरणें
आकाश की खोहों में
सोने चली गई हैं ।

चारों और
नैराश्य, संदेह
अवसाद का कुहासा
गहराने लगा है ।

मन क्या खोज रहा है ?

इन क्षण दृश्यों के
बदलते रूपों में
समग्रता, संगति
कहाँ है ?
वह तो तुम से
संयुक्त रहने में है ।

शरद शील

शरद आ गई है
श्वेत कृष्ण बलाकों की
मदिर चितवन लिए,–
शरद छा गई ।

स्वच्छ जल
नील नभ
उसी का कक्ष है ।
कांसों की दूध फेन सेज पर
चंदिरा सोई है ।
गौर पद्म सरोवर
उठता गिरता
उसी का वक्ष है ।

यह प्रिया की कल्पना है,
चंद्रमुखी प्रिया की ।
शोभा स्वप्न कक्ष में
देह भार मुक्त
शील उज्वल लौ
चंदिरा की ।

सरोवर जल में
रुपहरी आग है,-
राजहंस
स्वप्नों के पंख खोले हैं,
तुम्हारी रूप तरी में
प्राणों के शुभ्र पाल हैं,
नवले ।

ओ युवक युवतियो,
स्वच्छ चाँदनी में नहाओ,
नग्न गात्र, नग्न मन,-
आत्म दीप लिए,
मुक्त चाँदनी में आओ ।

नवीन देह बोध पाओ,-
रूप रेखाएँ देखो,
रूप सीमाएँ
पहचानो ।

ए तटस्थ प्रेमियो,
रूप विरक्त मत होओ;
रस स्रोत मन में है,
सौन्दर्य आनंद
भीतर हैं,-
देह में न खोजो ।

देह लजाती है,
अपनी सीमा जानती है;
प्रेम विरत होता है
रज गंध में सन कर;-
उसका मंदिर ह्रदय है ।

काले मेघों के महल
ढह गए,
चपला की चमक
कामना की दमक
मिट गई;-

यह सामाजिकता का
प्रासाद है,
शरद शुभ्र
भाव गौर,-
मानवता का स्फटिक प्रांगण ।

ओ युवक युवतियो,
शील सौम्य
शरद शुभ्र
चरण धर आओ ।

दृष्टि

अमृत सरोवर में
रति सागर में डूब
मैं पूर्ण हो गया ।

किसी वृहत् शतदल का
पराग है यह स्वर्ण धूलि,-
इसके कण कण में
मधु है ।

यह नील
अंत: स्पर्शी एकाग्र दृष्टि है,
जिसमें अनंत सृजन स्वप्न
मचल रहे हैं ।

तुम्हारी कामदेह शोभा
आदर्श है,
जिसमें शाश्वत बिम्बित है ।
रोम हर्ष
प्रकाश अंकुर हैं,
जिनमें नवीन प्रभात उदित है ।

वस्तु कभी वस्तु न थी,
तुम्हीं थी ।
भले दृष्टि न हो ।

तुम,-
जिसे प्रेम आनंद
प्रकाश, शांति
वाणी नहीं दे पा रहे,
अनंद शाश्वत
छू नहीं पा रहे;-

तुम्हीं हो,
भले दृष्टि न हो ।

अनुभूति

तुम आती हो,
नव अंगों का
शाश्वत मधु-विभव लुटाती हो।

बजते नि:स्वर नूपुर छम-छम,
सांसों में थमता स्पंदन-क्रम,
तुम आती हो,
अंतस्थल में
शोभा ज्वाला लिपटाती हो।

अपलक रह जाते मनोनयन
कह पाते मर्म-कथा न वचन,
तुम आती हो,
तंद्रिल मन में
स्वप्नों के मुकुल खिलाती हो।

अभिमान अश्रु बनता झर-झर,
अवसाद मुखर रस का निर्झर,
तुम आती हो,
आनंद-शिखर
प्राणों में ज्वार उठाती हो।

स्वर्णिम प्रकाश में गलता तम,
स्वर्गिक प्रतीति में ढलता श्रम
तुम आती हो,
जीवन-पथ पर
सौंदर्य-रहस बरसाती हो।

जगता छाया-वन में मर्मर,
कंप उठती रुध्द स्पृहा थर-थर,
तुम आती हो,
उर तंत्री में
स्वर मधुर व्यथा भर जाती हो।

प्रेम

मैंने
गुलाब की
मौन शोभा को देखा ।

उससे विनती की
तुम अपनी
अनिमेष सुषमा की
शुभ्र गहराइयों का रहस्य
मेरे मन की आँखों में
खोलो ।

मैं अवाकू रह गया ।
वह सजीव प्रेम था ।

मैंने सूँघा,
वह उन्मुक्त प्रेम था ।
मेरा ह्रदय
असीम माधुर्य से भर गया ।

मैंने
गुलाब को
आठों से लगाया ।
उसका सौकुमार्य
शुभ्र अशरीरी प्रेम था ।

मैं गुलाब की
अक्षय शोभा को
निहारता रह गया ।

अंतर्मानस

आ:, यह माणिक सरोवर,
रजत हरित, अमृत जल
अरुण सरोवर ।

नव सूर्योदय हुआ,…
अंत: तृष्णाओं के
रेशमी कुहासे
छंट गए,
देह लाज मान
मिट गए ।

आ:, यह उज्जवल लावण्य,
रस शुभ्र जल ।
ज्ञान ध्यान डूब गए,
श्रद्धा विश्वास
उतने स्वच्छ न निकले ।
समाधि ? निष्क्रिय,…
तन्मयता प्रेम मूढ़ थी ।

यह माणिक मदिर आलोक
नव जागरण निकला ।

देह अंधकार न थी,
अंत: सुख का पात्र बन गई;
इंद्रियाँ क्षणिक न थीं
नया बोध द्वार बन गईं ;
जीवन मृत्यु न था
नयी शोभा, नयी क्षमता बन गया ।

आकाश फालसई,
धरती मणि पद्म को घेर
हरित स्वर्ण हो उठी ।

ह्रदय का अनंत यौवन,
प्राणों की स्वच्छ आग निकला-
यह रत्न ज्वाल सरोवर ।

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