कला और बूढ़ा चाँद -सुमित्रानंदन पंत -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sumitranandan Pant Part 1

कला और बूढ़ा चाँद -सुमित्रानंदन पंत -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sumitranandan Pant Part 1

सहज गति

तुम्हारी वेणी के प्रकाश नीड़ में
मैरे स्वप्न चहकते हैं,-
ओ शुभ्र नीलिमे ।

जब तक अंधकार है
प्रकाश भी है ।
तुम्हारे पथ की
बाधा है ज्ञान,-
सबसे बडा अज्ञान ।
वैसे तुम चीन्ही हो,
चिर परिचित हो ।

जब तक अंधकार है
ज्ञान बंधन बनता रहेगा;
ज्ञान का फल खाकर
मैं अज्ञान में डूब गया ।
मन के
काले सुफेद
पंख उग आए ।

ड्योढ़ी के भीतर
केवल शांति,
नि:स्वर शांति,
नि:सीम शांति है ।

जिसका छोर पकड़े
ज्ञान अज्ञान शून्य
मैं बढ़ता जाता हूँ,…
बढ़ता जाता हूँ ।

ओ अंतरमयि,
तुम्हारा करुणा कर ही
ध्यान बन कर
गति हीन गति से
मुझे खींचता है ।

अपने स्थान पर
मैं तुम्हें पाता हूँ ।

मुख

सिन्धु मेरी हथेली में समा जाते हैं,
उन्हें पी जाता हूँ मैं,
जब प्यासा होता हूँ ।

प्राणों की आग में गल कर,
मैं ही उन्हें भरता हूँ ।
जब
सूख जाते हैं वे ।

सोने के दर्पण सी दमकती-
प्राणों की आग,
जिसमें आनंद
मुख देखता है ।

मुख,-चूर्ण नील अलकों घिरा,
अनिमेष, प्रेम दृष्टि भरा–
जो ज्ञान को हृदय देती है ।
अधर, अग्नि रेख से लाल
तृप्ति चूमती है जिन्हें ।
मेरा ही मन बनता है
वह मुख,…
जब मैं तुम्हें
स्मरण करता हूँ ।

मेरा ही मन बनता है
वह सुख,-
जब मैं तुम्हें
वरण करता हूँ ।

अज्ञात स्‍पर्श

शरद के
एकांत शुभ्र प्रभात में
हरसिंगार के
सहस्रों झरते फूल
उस आनंद सौन्‍दर्य का
आभास न दे सके

जो

तुम्‍हारे अज्ञात स्‍पर्श से
असंख्‍य स्‍वर्गिक अनुभूतियों में
मेरे भीतर
बरस पड़ता है ।

 प्रज्ञा

वन फूलों में
मैंने नए स्वप्न रंग दिए,
कल देखोगे ।
कोकिल कंठ में
नयी झंकार भर दी
कल सुनोगे ।

ये तितलियों के पंख
वन परियों को दे दो ;
चेतने,
तुम्हारी शोभा
विदेह चाँदनी है,
अपना ही परिधान ।

धरती अब
लट्टू सी घूमती है
तो क्या ?
हम बड़े हो गए ।

पर्वतों की बड़ी बड़ी उमंगें
अँगूठे के बल खड़ीं
शांत, मौन, स्थिर हैं ।

समतल दृष्टि
समूची पृथ्वी न देख पाई पी,-
ऊपर के प्रकाश से
समाधान हो गया ।

अब पंकस्थल पर भी चलें
तो ऊपर की दृष्टि
डूबने न देगी ।

यज्ञ

यह ज्योति दुग्ध है,
शुभ्र, तैल धारवत्,
जो शील है,
अमृत ।

ओ मुग्धाओ,
ओ शोभाओ,
अपना तारुण्य अर्पित करो
रचना मंगल को ।

यह मानवता का यज्ञ है,
मानव प्रेम का यज्ञ ।
तुम्हारे कोमल अंग
समिधा हों ।
लावण्य घृत हो,
प्रेम,–प्रेरणा,
मंत्र ।

रस यज्ञ है यह ।
नील विहग
रक्त किसलय
स्वर्ण हंस
फूल निर्झर-
सब आहुति हों,
पूर्णाहुति ।
छाया जल जाय,
नारी शेष रहे ।

मानस यज्ञ यह,
भाव यज्ञ ।
श्रद्धा, आस्था
लौ उठे ।
मन का मानव जगे ।
स्वर्ण चेतन
अमृत पुरुष,
रस मनुष्य ।

वह प्रकारों का प्रकाश है,
स्वर्ग रश्मि,
भू प्रदीप ।

ओ छायाओ,
मायाओ,
ओ कायाओ,
आहुति बनो,
पूर्णाहुति ।

प्रतीक्षा

नया चाँद निकल आया है
अतल गहराइयों से,
समुद्र से भी अतल गहराइयों से ।
स्वप्न तरी पर बैठा
स्फटिक ज्वाल,
लहरों की रुपहली लपटों से घिरा ।

रात की गहराइयाँ
सूरज को निगल जाती हैं;
तभी,
चाँद बन आई
तुम्हारी स्मृति ।

सभी रत्न नहीं भाते,
विष वारुणी
स्फटिक, प्रवाल
सर्प, शंख,–.
अमृत स्रोतस्विनी के तट पर
बिखरी पड़ी सृष्टि ।

चाँद भी…
कलंक न सही,—
उपचेतन गहराइयों का ही
प्रकाश है ।
प्यास नहीं बुझा पाता ।
अचेतन को
नहीं पिघला पाता ।

मन के मौन श्रृंगों पर
सुनहले क्षितिज
नव सूर्योदय की प्रतीक्षा में हैं ।

शुभ्र
अवाक्
आत्मोदय की ।

पट परिवर्तन

किरणों की
सुनहली आभा में
लिपटा नील
तुम्हारा उत्तरांग
और
तरंगित सागर
मुक्ताफेन जड़ी
हरी रेशमी साड़ी पहने
तुम्हारी
कटि तक डूबी
आधी देह है ।

किसे ज्ञात था,
पलक मारते ही
ओस के धुएँ के
बादल-सा
यह संसार
आँखों से ओझल हो जाएगा ।
अंतर में
तुम्हीं
शेष रह जाओगी ।

ओ विराट, चैतन्य
यह मैं क्या देखता हूँ

कि घर बाग पेड़
और मनुष्य
किसी अदृश्य पट में
चित्रित भर हैं ।
ये वास्तविक सत्य नहीं,
मोम के पुतले भर हैं ।

रथवान
अश्व को चाबुक मारता है,
वह तुम्हारी ही
पीठ पर पड़ रहा है ।
और तुम
खिलखिलाकर
भीतर
हँस रहे हो ।

ओ अद्वितीय,
अतुलनीय,
मैं आश्चर्य में डूबा
अवाक्
तुम्हीं में डूबा हूँ ।

अमृत

मैं सूर्य की किरणें दुहूँ
तुम चाँद की ।
मैं तुम्हें प्रकाश हूँ
तुम प्यार ।

मैं उच्च पर्वत शिखरों से
बोलूं…
जहाँ पौ फटने के पहिले
फालसई नीलिमाओं के कुंज में
उषा की सलज लालिमा में लिपटी
श्वेत कमल कली सी
शांति, मौन सोई है ।

तुम सागर की गहराइयों से गाना,
जहाँ फेनों के मोती डालती
लहरों पर
रुपहली चंद्र ज्वाल तरी का
मोहित गवाक्ष खोले
स्तनों की सतरेंग छाया में लिपटी
स्वप्न पंख
भावना अप्सरी रहती है,
अनिमेष शोभा में जगी ।

समुद्र तल में अनेक रत्न हैं,
जिनके मूल रंग
और आदि ज्योति
ऊपर की अमलताओं में-
हीरक झरनों के सूतों सी
दमकतीं
सूर्य किरणों में हैं ।

चन्द्रमा का
शुभ्र पीत पावक भी
सूर्य प्रकाश का ही
नवनीत है ।

सूर्य चंद्र
सत्य ही के वत्स हैं-
शांति और शोभा
श्रद्धा और भक्ति
उसी की धेनुएँ हैं ।

ये किरणें भी
कामधेनु हैं,-
जिनके स्तनों से
धारोष्ण प्रकाश
मधूशीत अमृत
बहता है ।

जो आनंद,
प्रेम सत्य ही का दुग्ध है,
जिसे पीकर
सूर्य चंद्र पलते हैं ।
वही
प्रकाश और अमृत है ।

घर

समुद्र की
सीत्कार भरतीं
आसुरी आँधियों के बीच
वज्र की चट्टान पर
सीना ताने
यह किसका घर है ?
सुदूर दीप स्तंभ से
ज्योति प्रपात बरसाता हुआ !…
या जलपोत है ?

नाथुनों से फेन उगलतीं
अजगर तरंगें
सहस्र फन फैलाए
इसे चारों ओर घेरे
फूत्कार कर रही हैं !
उनकी नाड़ियों में
लालसा का कालकूट
दौड़ रहा है !

वे अतृप्ति की
ऐंठती रस्सियों सी
इसे कसे हैं !
इस निर्जन
स्फटिक स्वच्छ मंदिर के
मुक्ताभ कक्ष में
कल रात चाँद
चाँदनी के संग
सोया था !
किरणों की बाँहों में
चंदिरा की
अनावृत ज्वाला को
लिपटाए !

तब
लहरों के फेनिल फनों में
स्वप्नों की मणियां
दमक रही थीं !
सवेरे
इसी मंदिर के अजिर में
अरुणोदय हुआ !
रक्त मदिरा पिए !

रात और प्रभात
पाहुन भर थे !–
यह धरती का घर है,-
(आकाश मंदिर नहीं ! )
हरिताभ शांति में
निमज्जित !

सिन्धु तरंगें
पंक सनी टाँगों से बहती
धरा योनि की दुर्गंध
धो धोकर
कड़ुवाती
मुंह बिचकाती,
पछाड़ खाती रहती हैं !

यह धरती पुत्र
किसान का घर है,–
द्वार पर
पीतल के चमचमाते
जल भरे कलस लिये,
सिर पर आँचल दिये,
युवती बहू खडी है,–
अनंत यौवना
बहू !

बिम्ब

तुम रति की भौं हो
कि काम का धनु खंड ?
ओ चाँद,
यह रेशमी आशा बंध
तुम्हीं ने बुना ।
जिसमें
किरणों के असंख्य रंग
उभर आए हैं ।

ओ प्यार के टूटे दर्पण,
तुम्हारा खंड खंड पूर्ण है ।
जिसमें अपूर्ण भी
संपूर्ण दिखाई देता है ।
यह कौन सी आग है
माखन सी कोमल,
स्तन सी मांसल ।
इसमें जलना ही
सोना बनना है ।

विरह का गरल
अमृत बन
कब का शिव हो गया,-
तुम्हारा शशि सा पद नख
भाल पर धारण कर ।

लाल फूलों की लौ-
मेरी लालसा–
जीभ चटकारती है ।
निर्जन में लेटी चाँदनी
तुम्हारी ओर ताकती है ।
तुम्हारी सात्विक सुधा
प्राणों की समस्त ज्वाला
पी लेती है ।

ओ अमृत घट,
ज्ञान के नि:सीम नील में
सुनहले आशा के बंध के भीतर
तुम्हीं हो,-
प्यास की अनंत लहरियों में
रुपहली नाव खेने वाले
आत्म मग्न
तुम्हीं हो ।-
मैं नहीं ।

इंद्रिय प्रमाण

शरद के
रजत नील अंचल में
पीले गुलाबों का
सूर्यास्‍त
कुम्‍हला न जाय,-
वायु स्‍तब्‍ध…
विहग मौन … ।

सूक्ष्‍म कनक परागों से
आदिम स्‍मृति सी
गूढ गंध
अंत में समा गई ।

जिस सूर्य मंडल में
प्रकाश
कभी अस्‍त नहीं होता,
उसकी यह
कैसी करूण अनुभूति,-
लीला अनुभव ।

नयी नींव

ओ आत्म व्यथा के गायक,
विश्व वेदना के पहाड़ को
तिल की ओट कर,

अपने क्षुद्र तिल-से दुख का
पहाड़ बनाकर
विश्व ह्रदय पर
रखना चाहते हो ?

अहंता में पथराई
निजत्व की दीवार तोड़ी,
यह वज्र कपाट
तुम्हें बंदी बनाए है ।

आत्म मोह के
इस घने अंधियाले
वन के पार
नये अरुणोदय के
क्षितिज खुले हैं ।

जहाँ
ममता अहंता और
आत्म रति के कृमियों को
पैरों तले रौंदते-कुचलते
असंख्य चरण
श्रम स्वेद के पंक में सने-
निरंतर
आगे बढ़ रहे हैं ।

ओ निजत्व के वादक,
इस अरण्य रोदन से लाभ ?
अपने पर
आँसू मत बहाओ ।

अरण्य और सत्य के बीच
कांति धैर्य और निष्ठा की
दुर्भेद्य मेखला है,—
जिसके पार
तेरा रिक्त रुदन
नहीं पहुँचेगा ।

वहाँ,
अपने सुख दुख भूलकर
प्रबुध्द मानवता
सुनहले अंतरिक्षों में
नवीन
भू रचना की नींव’
डाल रही है ।

रूपांध

सत्य कथा
सत्य से-
प्रेम व्यथा
प्रेम से
अधिक बढ़ गई ।

रूपहले बौर
झर न जायें,
बने रहें ।-
आम्र रस सृष्टि
भले न हो ।
सूनी डालों पर
कुहासे घिरे
ओस भरे
आशा बंध

(मानस व्यथा के प्रतीक)
पतझर की सुनहली धूल
आँचल में समेटे रहें,-
कोयल न बोले ।

तंतुवाय सा
मैं-अपने ही जाल में
फँसा रहे, …
सूरज चाँद तारे भी
उसी में उतर आएँ ।

ओ छिछले जल में
वंशी डालने वाले,
ये कीड़े मकौड़े
सांप घोंघे हैं ।
जिन्हें तुम मछलियाँ
रुपहली कलियाँ समझे हो ।

जल अप्सरियाँ
रत्न आभाओं में लिपटीं
अमेय गहराइयों में
रहती हैं ।

यदि निर्मल
मुक्ताभ अतलताओं से-
सुनहली किरणों सी
जल देवियाँ

कभी बाहर
लहरों पर तिरने आ जायें,
तो यह नहीं
सत्य सत ही होता है,

और
छिछली तलैया में डूबकर
तुम
फेन के मोती चुगो ।

ओ मेरे रूप के मन,
तेरी भावना की गहराइयाँ
अरुप हैं ।

वाचाल

‘मोर को
मार्जार-रव क्यों कहते हैं मां’

‘वह बिल्ली की तरह बोलता है,
इसलिए ।’

‘कुत्ते् की तरह बोलता
तो बात भी थी ।
कैसे भूंकता है कुत्ता,
मुहल्ला गूंज उठता है,
भौं-भौं ।’
‘चुप रह !’

‘क्यों मां ?…
बिल्ली बोलती है
जैसे भीख मांगती हो,
म्या उं.., म्या उं..
चापलूस कहीं का ।
वह कुत्तेी की तरह
पूंछ भी तो नहीं हिलाती ‘-
‘पागल कहीं का ।’

‘मोर मुझे फूटी आंख नहीं भाता,
कौए अच्छे लगते हैं ।’
‘बेवकूफ ।’

‘तुम नहीं जानती, मां,
कौए कितने मिलनसार,
कितने साधारण होते हैं ।…
घर-घर,
आंगन, मुंडेर पर बैठे
दिन रात रटते हैं
का, खा, गा …
जैसे पाठशाला में पढ़ते हों ।’

‘तब तू कौओं की ही
पांत में बैठा कर ।’

‘क्यों नहीं, मां,
एक ही आंख को उलट पुलट
सबको समान दृष्टि से देखते हैं ।-
और फिर,
बहुमत भी तो उन्हीं का है, मां ।’
‘बातूनी ।’

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