कला और बूढ़ा चाँद -सुमित्रानंदन पंत -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sumitranandan Pant Part 7

कला और बूढ़ा चाँद -सुमित्रानंदन पंत -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sumitranandan Pant Part 7

धर्मदान

यह प्रकाश है,
तुम इसमें क्या खोजोगे,
क्या पाओगे ?-
यह दीप
तुम्हें सौंपता हूँ !

यह अग्नि है,
तुम किन आनंदों के
यज्ञ करोगे,
किन कामनाओं की
हवि दोगे ?-
यह वेदी
तुम्हें सौंपता हूँ !

यह प्रकाश और अग्नि ही नहीं,
गति है, जीवन है,
तुम किन लोकों में
जा पाओगे ?-
यह किरण
तुम्हें सौंपता हूँ ।

यह अग्नि
अंतर अनुभूति है,
तुम सत्य के स्रोत को
देख पाओगे कि नहीं ?
यह अभीप्सा
यह प्रेरणा
तुम्हें सौंपता हूँ !

रक्षित

तुम संयुक्त हो ?

फूल के कटोरों का मधु
मधुपायी पी गये
तो, पीने दो उन्हें !

नया वसंत
कल नये कटोरों में
नया आसव ढालेगा !

तुम्हारी देह का लावण्य
यदि इंद्रिय तृष्णा
पी गई हो
तो, छक कर पी लेने दो !
आत्मा के दूत
कल, नये क्षितिजों का सौन्दर्य
आँखों के सामने
खोलेंगे !

प्रेम
देह मन में सीमित,–
वियोगानल में
जल रहा हो,
जलने दो,-
वह सोने सा तपकर
नवीन कारुण्य
नवीन मांगल्य के
ऐश्वर्यों में
विकसित होगा !

तुम संयुक्त हो न !

नया देश

ओ अन्धकार के
सुनहले पर्वत,
जिसने अभी
पंख मारना नहीं सीखा,-

जो मानस अतलताओं में
मैनाक की तरह पैठा है,
जिसमें स्वर्ग की’
सैकडों गहराइयाँ
डूब गई हैं ।

मैं आज
तुम्हारे ही शिखर से
बोल रहा हूँ । ….

तुम, जिससे
स्वप्न देही
शंख गौर ज्योत्स्नाएँ…
कनक तन्वी
अहरह कांपती
विद्युल्लताएँ’ ”

भावी रंभा उर्वशियों सी
फूल बाँह डाले
आनंद कलश सटाए
लिपटी हैं,…

ओ अवचेतन सम्राट,
यह नया प्रभात
शुभ्र रश्मि मुकुट बन
तुम्हारे ही शिखर पर
उतरा है ।

तुम सत्य के
नये इंद्रासन हो ।
यह नाग लोक का
चितकबरा अंधकार
तुम्हारा रथ है ।

शची
रक्त पद्म पात्र में
अनंत यौवन मदिरा लिए
खड़ी है ।
रंभा मेनका
उसीकी परछाई हैं ।

ओ हेम दंड नृप
तुम विष्णु के अग्रज हो,…
यह आनंद पर्व है,
अपने द्वार खोलो ।
इन नील हरी
पेरोज घाटियों में
फालसई मूँगिया प्रकाश
छन कर आ रहा है ।

मयूर
रत्नच्छाय बर्हभार खोले हैं ।
मोनाल डफिए
अँगड़ाई लेकर
पंखों का इंद्रधनुषी ऐश्वर्य
बरसा रहे हैं,.…

एक नया नगर ही बस गया है । _
ओ मुक्ताभ,
यह नया देश, नया ग्राम
तुम्हारी राजधानी है ।
हृदय सिंहासन
ग्रहण करो ।

रहस्य

इन रजत नील ऊंचाइयों पर
सब मूल्य, सब विचार
खो गए ।

यहाँ के शुभ्र रक्ताभ
प्रसारों में
मन बुद्धि लीन हो गए ।

तुम आती भी हो
तो अनाम अरूप गंध बन कर,
स्वर्णिम परागों में लिपटी
आनन्द सौन्दर्य का
ऐश्वर्य बरसाती हुई ।

ओ रचने,
तुम्हारे लिए कहाँ से
ध्वनि, छंद लाऊँ ?
कहाँ से शब्द, भाव लाऊँ ?

सब विचार, सब मूल्य
सब आदर्श लय हो गए ।
केवल
शब्दहीन संगीत
तन्मय रस,….
प्रेम, प्रकाश और प्रतीति ।

कहाँ पाऊँ रूपक,
अलंकरण, कथा ?
ओ कविते,
ये मन के पार के
पवित्र भुवन हैं,…

यहाँ रूप रस गंध स्पर्श से परे
अवाक् ऊंचाइयों
असीम प्रसारों
अतल गहराइयों में
केवल
अगम शांति है ।
अरूप लावण्य,
अकूल आनंद,
प्रेम का
अभेद्य रहस्य ।

 सूर्य मन

लज्जा नम्र
भाव लीन
तुम अरुणोदय की
अर्ध नत
शुभ्र पद्म कली सी
लगती हो ।

औ मानस सुषमे,
प्रभात से पूर्व का
यह घन कोमल अंधकार
तुम्हारा कुंतल जाल सा
मुझे घेरे है ।

सामने
प्रकाश के
पर्वत पर पर्वत
खड़े हैं ।…
उनकी ऊँची से ऊँची
चोटियों के फूलों का मधु
मेरा गीत भ्रमर
चख चुका है ।

अब,
मन
तुम्हारी शोभा का प्रेमी है,
तुम्हारे चरण कमलों का मधु पीकर
आत्म विस्मृत हो
वह गुंजरण करना
भूल जाना चाहता है ।

मन का गुंजरण
थम जाने पर
तुम्हारा शुभ्र संगीत
स्वत: सूर्यवत्
प्रकाशित हो ।

 एक

नील हरित प्रसारों में
रंगों के धब्बों का
चटकीला प्रभाव है,……

शुभ्र प्रकाश
अंतर्हित हो गया ।

सूरज, चाँद और मन
प्रकाश के टुकड़े हैं,
बहु रूप ।

दर्पण के टुकड़ों में
एक ही छबि है,
अपनी छवि ।

तुम्हारा प्रकाश
अनेक रूप है,
जिसका सर्व भी दर्पण नहीं ।

यह इंद्रधनुष
द्रोपदी का चीर है,
इसका अशेष छोर
शुभ्र किरण थामे है…
जो हाथ नहीं आती ।

शब्द चींटियों की पाँति से
चलते रहेंगे-
देश काल अनंत हैं ।

तुम सीमा रहित
अस्तित्व मात्र
कौन बिन्दू हो ?.…
जिसके सामने
चींटी
पर्वत-सी लगती है ।

अकूल, कौन सिन्धु हो ।
अश्रु कण में भी
समा जाती हो ।

शरद

श्यामल मेघ
रूपहले सूपों की तरह
सिन्धु जल की
निर्मलता बटोरकर
तुम पर उलीचते रहे ।

ओ सुनहली आग,
अविराम वृष्टि से
धुलने पर
तुम्हारी दीप्ति बढ़ती गई ।

ओ स्वच्छ अंगों की
शरद ।
तुम्हारे लावण्य का स्पर्श
मुझसे सहा नहीं जाता । _
स्वप्न गौर शोभे,
ओ शीत त्वक् अग्नि ।

धुली अँधियाली के
रेशमी कुंतल,-
स्निग्ध नीलिमा नत
चितवन,
रक्त किसलय अधर
नवल मुकुलों के अंग ।-
ओ गंध मुग्ध फूल देह,
दुग्ध स्नात, सौम्य
चंद्रमुख
वसंत ।

तुम्हारा रूप देख
सूरज, नत मुख,
सहम गया ।
उसकी रेशमी किरणें
पक्षियों के रोमिल पंखों सी
सिमट गईं ।

लो,
साँझ उषाएँ
प्रसाधन लिए
द्वार पर खडी हैं ।

ताराएँ
पलक मारना
भूल गई हैं ।

ओ सुखद, वरद,
शरद ।
आनंद
तुम्हारी शुभ्र सुरा पी
अवाक् है ।

 शंख ध्वनि

शंखध्वनि
गूँजती रहती,–
सुनाई नहीं पड़ती ।

त्याग का शुभ्र प्रसार,
ध्यान की मौन गहराई,
समर्पण की
आत्म विस्मृत तन्मयता,
आवेग की
अवचनीय व्यथा
और,
प्रेम की गूढ़ तृप्ति
शंखध्वनि ,…
सुनाई नहीं पड़ती,
सुनाई नहीं पड़ती ।

श्रवण गोचर ?
इंद्रिय गोचर ?
ऐसी स्थूल
कैसे हो सकती है
शंख ध्वनि ?…

गूँजती रहती,
वह
गूँजती रहती ।

हे वन पर्वत, आकाश सागर,
तुम निविड़ हो, उच्च हो,
व्यापक हो, निस्तल हो ।
कहाँ है अनंत और शाश्वत ?

शंखध्वनि
अणु अणु में व्याप्त
इन सब से परे,
परे, परे,
सुनाई पड़ती,
निश्चय
सुनाई पड़ती ।

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