कमी न की तिरे वहशी ने ख़ाक उड़ाने में-कविता -फ़िराक़ गोरखपुरी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Firaq Gorakhpuri

कमी न की तिरे वहशी ने ख़ाक उड़ाने में-कविता -फ़िराक़ गोरखपुरी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Firaq Gorakhpuri

कमी न की तिरे वहशी ने ख़ाक उड़ाने में
जुनूँ का नाम उछलता रहा ज़माने में

जुनूँ से भूल हुई दिल पे चोट खाने में
‘फ़िराक़’ देर अभी थी बहार आने में

उसी की शरह है ये उठते दर्द का आलम
जो दास्ताँ थी निहाँ तेरे आँख उठाने में

वो कोई रंग है जो उड़ न जाए ऐ गुल-ए-तर
वो कोई बू है जो रुस्वा न हो ज़माने में

ब्यान शम्अ है हासिल यही है जलने का
फ़ना की कैफ़ियतें देख झिलमिलाने में

ग़रज़ कि काट दिए ज़िंदगी के दिन ऐ दोस्त
वो तेरी याद में हों या तुझे भुलाने में

हमीं हैं गुल हमीं बुलबुल हमीं हवा-ए-चमन
फ़िराक़ ख़्वाब ये देखा है क़ैद-ख़ाने में

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