कब उस का विसाल चाहिए था-गुमाँ-ग़ज़लें-जौन एलिया -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Jaun Elia

कब उस का विसाल चाहिए था-गुमाँ-ग़ज़लें-जौन एलिया -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Jaun Elia

कब उस का विसाल चाहिए था
बस एक ख़याल चाहिए था

कब दिल को जवाब से ग़रज़ थी
होंटों को सवाल चाहिए था

शौक़ एक नफ़स था और वफ़ा को
पास-ए-मह-ओ-साल चाहिए था

इक चेहरा-ए-सादा था जो हम को
बे-मिस्ल-ओ-मिसाल चाहिए था

इक कर्ब में ज़ात-ओ-ज़िंदगी हैं
मुमकिन को मुहाल चाहिए था

मैं क्या हूँ बस इक मलाल-ए-माज़ी
इस शख़्स को हाल चाहिए था

हम तुम जो बिछड़ गए हैं हम को
कुछ दिन तो मलाल चाहिए था

वो जिस्म जमाल था सरापा
और मुझ को जमाल चाहिए था

वो शोख़ रमीदा मुझ को अपनी
बाँहों में निढाल चाहिए था

था वो जो कमाल-ए-शौक़-ए-वसलत
ख़्वाहिश को ज़वाल चाहिए था

जो लम्हा-ब-लम्हा मिल रहा है
वो साल-ब-साल चाहिए था

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