कनाट पैलेस- शायरी-कृष्ण बेताब -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Krishan Betab

कनाट पैलेस- शायरी-कृष्ण बेताब -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Krishan Betab

कनाट पैलेस जिसे बारा खम्बा भी कहते हैं
हसीनों की जिसको हसीं गुज़रगाह भी कहते हैं

ये मरकज़-ए-हिन्द की इक रंगीन सी बसती है
हसीन इस पर और ये हसीनों पर मरती है

इसका बावक्त-ए-शाम कोई नज़ारा देखे
सुना हो जिसे अफ़सानों में वह शाहपारा देखे

लम्बी लम्बी कारें और उनकी रानाईयां
आ जाये गर कोई भूल जाए तनहाईयां

दुनिया के हर गोशे की तितली यहां होती है
थिरकती सुबकती यहां से वहां होती है

अंधेरा हो तो ईवां यूं जगमगाते हैं
महल में फ़ानूस जैसे मुस्कराते हैं

कुशादा सड़कों पे लहराती साड़ियों की रमक
हीरों की कहीं पन्नों की बिख़री है दमक

रिसमसाते आंचल हवा में मस्त लहराते हैं
जवां शानों से दुपट्टे सिरक सिरक जाते हैं

बारोअब दुकानें हैं बड़े बड़े शीशों की
लम्बी कतारें हैं देशों की बिदेशों की

रीगल और प्लाज़ा की उफ़ क्या बहार होती है
बाग़-ए-हुस्न की हर कली पुर बहार होती है

मशरिक और मग़रिब का हुस्न यहां यकजा है
न ख़याल में किसी के मन्दर है न गिरजा है

रैसतोरां भरे हैं शोख़ सी हसीनों से
मस्तानी नाज़नीनों से दीवानी महज़बीनों से

ज़र्रे ज़र्रे से इतर की कितनी महक आती है
तबीयत बिलावज्हा ही तो बहक जाती है

मगर कुछ दूर जा कर ज़रा देखें अगर हम
शायद देखा न जाये थाम लें अपना जिगर हम

यहां मुयस्सर हैं महल शीशों के अमीरों को
ढूंढने से भी नहीं मिलते झोंपड़े ग़रीबों को

वह गरम कमरों में रेशमी बिस्तर में लिपटे हैं
ये देखो बदनसीब अख़बारों में सिमटे हैं

रानाई हर शै में जो यहां नज़र आती है
परछाईं इसमें दहकां की नज़र आती है

मैं भूले भटके से इक बार जो यहां आ गया
उलझ गया खो गया बस देख देख उकता गया

बेशक यहां की बातें अनोखी हैं निराली हैं
ग़रीब के लिये मगर ये ज़हर की प्याली हैं

मुझ से तो झूठे सपने यूं सजाए नहीं जाते
महल रेत के दिल में इस तरह बनाये नहीं जाते

सख़्त घिन है मुझे इनसे इनके किरदार से
नकली झूठे इनके इस हुस्न के बाज़ार से

मुझे न चाहिये ये ऐश न रंग न राग
मुझे मुबारक मकई की रोटी सरसों का साग

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