कथा एक रात की-एक प्रयाण-राजगोपाल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rajagopal

कथा एक रात की-एक प्रयाण-राजगोपाल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rajagopal

यह दिन भी कितनी जल्दी ढलता है
प्रत्युषा में उठता मन जलता है
तृष्णा में वह मृग सा दौड़ा जाता है
बीती स्मृतियाँ साथ लिए पथ में कहीं
थका रसिक ठूंठ से टिका रोता है
यह दिन भी कितनी जल्दी ढलता है ||१||

तुम्हे देखने रात से घुटने टेका,
श्रांत हुई आंखे सपनों से सेंका,
तुम ओझल हो न जाओ कहीं,
यह सोच मन बहुत घबराता है,
यह दिन भी कितनी जल्दी ढलता है ||२||

लगा उसे भी प्रत्याशा होगी,
उर से कृष्ण कक्ष तक भीगी होगी,
पर मुझसे मिलने को कौन विकल
उसे पता क्या होती मन की चंचलता है,
यह दिन भी कितनी जल्दी ढलता है ||३||

रात की बातें साथ लिए सारा,
मै लौट चला हूँ जीवन से हारा,
तुम्हे संवेदना कैसी, कैसा मन का अभिसार,
यह शिथिल प्रश्न जीवंत हुआ हर बार उभरता है,
यह दिन भी कितनी जल्दी ढलता है ||४||

दिन डूबा, सूरज लगा है अब अस्त होने
बरसों से छाया था जो प्यार ह्रदय में,
छिप रहा था अंधकार के भय से,
हम निर्भय भीड़ चीर कर निकले थे सुबह
अब तक तो प्यार की प्रतिकृति भी लगी है खोने,
दिन डूबा, सूरज लगा है अब अस्त होने ||५||

हमने खेला था अधरों से कुंतल तले,
कितनी बार सलवटों पर फिर गीले हाथ मले,
प्यार के फूलों पर अब धूल की तह सी जमी है,
खेल-घिरोंदे छोड़ हम एक-दूसरे पर पीठ किये लगे हैं सोने,
दिन डूबा, सूरज लगा है अब अस्त होने ||६||

तुम्हारी गोद में मैंने कितने रंग सजाये,
हमने बच्चों के साथ फिर कितने सुर गाये,
बरसों के लिपटे स्नेह गर्त से, आज छिटक कर बिखरा है मौन,
देखो अपनी ही छाया चली प्राची में विलीन होने,
दिन डूबा, सूरज लगा है अब अस्त होने ||७||

हमने सुषमा भर-भर छत बनाया था गगन में
नित देख उसे होता था उच्छास तन-मन में,
अब दब गया उस बीते जीवन का उत्कर्ष,
चालीस वसन्तो की छाजन, अब जैसे लगी है खोने,
दिन डूबा, सूरज लगा है अब अस्त होने ||८||

सूरज डूबा, लालिमा उतरी, अब अंत हुआ उजियाला,
बुना था एक नीड़ हमने भी साथ-साथ,
कोलाहल से दूर गुंथ दोनों के कर्मठ हाथ,
पर किसकी है आज प्रतीक्षा इस प्रणय कुंज में,
इस अंधकार में तो मौन संगिनी ने डेरा डाला,
सूरज डूबा, लालिमा उतरी, अब अंत हुआ उजियाला ||९||

जब साँसे उलझी, छोटा सा दिया जलाया,
मन उछला फिर स्तब्ध हुआ, पता नहीं क्या खोया,
स्वयं को छल कर कहते, हम प्रेमी हैं विहंगों से निश्छल,
कैसा मन, किसकी माया, जीवन भर यह भ्रम पाला,
सूरज डूबा, लालिमा उतरी, अब अंत हुआ उजियाला ||१०||

जिसे देख बहते आंसू सूखे, मैंने उर में उसे सजाया,
क्यूँ उसकी डाली-डाली सूखी, मन की मृदा से जिसे बनाया,
स्वांग भरे सब, जुगनू भी कह रहे स्वयं को आकाशदीप,
लहरों पर नीड़ ढूंढ रहा, फिर पंछी कोई लिये गहन उर का छाला,
सूरज डूबा, लालिमा उतरी, अब अंत हुआ उजियाला ||११||

कुछ सोचो अपनी भी, क्या खुश हो तुम ऐसे ही,
जब पहली बार कुछ बोला, था वह पल क्या वैसे ही,
जब काटती थी धार अकेले में, जाना कृपाण की भी होती है भाषा,
मुख की माधुरी, मन की मृदुला, फिर क्यूँ कुछ छाया है काला,
सूरज डूबा, लालिमा उतरी, अब अंत हुआ उजियाला ||१२||

अंधकार उठा, घुघुआ बोला, अब चल बसी संध्या गगन से,
जीवन की थाह जान ली हमने अब तक चलते,
कभी जिया, कभी मूर्छित से समय तले जलते,
सर लटकाए कभी सोचते धूमकेतु सा कैसा था वह अनुराग,
भावनाएं मरीं, आकर्षण टूटा, जिसे अब तक थमा था लगन से,
अंधकार उठा, घुघुआ बोला, अब चल बसी संध्या गगन से ||१३||

जब लम्बा सन्नाटा छाता, एक टेढ़ा प्रश्न उभरता,
सोचो, उत्तर उसका कैसे अन्तरंग में है बस सकता,
मन-मूक बने दीवारों पर खोजते कहाँ से आ रही प्रतिध्वनियाँ,
कान हुए जैसे अँधा कुआँ, अपने ही शब्द लड़ते रहे पवन से,
अंधकार उठा, घुघुआ बोला, अब चल बसी संध्या गगन से ||१४||

कल तक गुनगुनाहट भी लगती जैसे बुलबुल की बोली,
कुछ भी कहे-सुने आज तो लगता फिर जल गई होली,
करवट लिए रातों में बातें कर लेता दीवार पर टंगी रति से,
नि:शब्द ही उसने कुछ कहा, और गिर पड़े आँसू नयन से
अंधकार उठा, घुघुआ बोला, अब चल बसी संध्या गगन से ||१५||

समझता था स्मृतियाँ संवार लेती हैं बिखरे पल,
जब भावना ही नहीं रही तो कैसी आशा और कैसा छल,
बंद किवाड़ों में भी अजनबी हुए हम, सुबह कैसे पारिजात पर चलते,
प्यार का मह-प्रयाण उठा, आँखों के सामने, जीवन के गहन से,
अंधकार उठा, घुघुआ बोला, अब चल बसी संध्या गगन से ||१६||

रात गहराई रौंद धरा, अँधेरा पल-पल बढ़ता ही जाता,
चादर ओढ़े दिखता नहीं था मन का अंतर,
पर मन थापेड़ें सहता जैसे ज्वार उठा हो उर के अन्दर,
रात भरी सपनों में हंसते-रोते, सुबह फिर रात गयी-बात गहराई,
अपनी-अपनी सबकी वेदना, कौन किसे अपना दुःख बतलाता,
रात गहराई रौंद धरा, अँधेरा पल-पल बढ़ता ही जाता ||१७||

अँधेरे में चेहरा भी दिखता तपा हुआ चटका प्याली,
जिसमे उदासीन सी सिमटी थी स्मृतियों की लाली,
होंठ भी कैसे टिकते चटकी दीवार पर, कटने की आशंका तो गहरी थी,
दिखता जब कोई राह कहीं, शंकित सा पग है फिसला जाता,
रात गहराई रौंद धरा, अँधेरा पल-पल बढ़ता ही जाता ||१८||

डर लगता है चलने में जीवन के इस मरुभूमि पर,
कर लेते कुछ उड़ते समझौते, बर्फ रख अपने तलुओं पर,
जी रहे हैं अपने ही कांटे लिए, बिन पानी के पौधों सा,
फिर भी ताड़ से तने रहना, है प्रबल सत्ता की याद दिलाता,
रात गहराई रौंद धरा, अँधेरा पल-पल बढ़ता ही जाता ||१९||

निशा चीर जब जुगुनू चमकते, लगता यहीं-कहीं बिखरी चांदनी,
भ्रम ही सही, उदास रातों में भी, कुछ पल तो हो जाते धनी,
आँखों पर पट्टी बांधे टटोलते हम दुपहरी में भी रोशनी के स्त्रोत,
पास में अँधेरा घना, पर दूर कोई बुझता दीप दिख ही जाता,
रात गहराई रौंद धरा, अँधेरा पल-पल बढ़ता ही जाता ||२०||

ठंड बढ़ी, सिहरन चढ़ी, तुम मन की व्यथा क्या समझ पाओगे,
पीछे रजकण सी स्मृतियाँ, आगे सूखे पत्ते सा जीवन शेष,
सावन सी गिरती-पड़ती आशाएं, और कीचड़ में लिपटा वेश,
सब मिल जाना है हर-हर करते, अँधेरे अंतरिक्ष में कहीं,
फिर भी उस पथ जाकर और कितनी उम्र उलझ पाओगे,
ठंड बढ़ी, सिहरन चढ़ी, तुम मन की व्यथा क्या समझ पाओगे ||२१||

तन का हाहाकार और अधरों पर अटकी चुप्पी मन की,
तोडती लय ह्रदय की कहती, यही कहानी है स्वजन की,
कस्तूरी उडती थी जिस सुन्दर उपवनसे, वह भी अब हुआ विजन,
इतने तोड़-मरोड़ से हुए तन-मन के अष्ट वक्र कैसे सुलझ पाओगे,
ठंड बढ़ी, सिहरन चढ़ी, तुम मन की व्यथा क्या समझ पाओगे ||२२||

टूटी खाट पर सिसकता मन अच्छा ही था,
तुम्हारी गोद में खेलता प्यार तब बच्चा ही था,
दांव-पेंच यह अन्दर-बाहर का छल, पता नहीं था कितना होगा,
शलभ भी कैसे पूछे दिया से, मै तुम पर मरुँ तो क्या बुझ पाओगे,
ठंड बढ़ी, सिहरन चढ़ी, तुम मन की व्यथा क्या समझ पाओगे ||२३||

देह धरे रह गए, अब मन पर भी अधिकार हारे,
आसमान झांकते सारी रात बिताते पैर पसारे,
कैसे ह्रदय फाड़ कर दिखाएँ, प्यार का विस्तार तुमको,
स्तब्ध ही सही, क्या तुम अन्दर उठता तूफान समझ पाओगी,
ठंड बढ़ी, सिहरन चढ़ी, तुम मन की व्यथा क्या समझ पाओगे ||२४||

जाने कब आँख लगी, लगता बंद आँखों में भी बसा है छल,
सच है इतिहास झूठ नहीं बोलता,
फिर क्यूँ उस पर टिका, वर्तमान है डोलता,
दीवार पर टंगी प्रतिमा कहती है, मैं आज भी वही हूँ,
पर कुछ तो बदला है, तुममे दिखता नहीं है वह बीता कल,
जाने कब आँख लगी, लगता बंद आँखों में भी बसा है छल ||२५||

फिर भी आकर्षित है मन टूटा-फूटा,
सपनों ने कितना लूटा फिर भी मोह न छूटा,
आज भी तुम्ही मनोरथ हो चाहे मरीचिका में मर जाऊं,
कुछ साँसे और बची हैं, हे ईश्वर मुझको देना संबल,
जाने कब आँख लगी, लगता बंद आँखों में भी बसा है छल ||२६||

मन मसोसता कभी तो गिरतीं इप्सा की कलियाँ,
फिर जाकर चालीस बरस पीछे, बटोरता झरी फलियाँ,
उड़ गए घर के छप्पर, मचाया बहुत उत्पात, फिर आज को बदलने,
पर मैं हार गया छूने प्यार के छिपे मादक कोमल दल,
जाने कब आँख लगी, लगता बंद आँखों में भी बसा है छल ||२७||

लगता लुट गए मेरे नीड़ के संजोए तृण-पात,
मै ढूंढता दिन-रात उन्हें और खाता मुँह की घात,
मन बावला, वाचाल स्यार सा कुछ कहता या फिर करता,
जलते आलिंगन में फिर बरसाता, आँखों से सावन सा जल,
जाने कब आँख लगी, लगता बंद आँखों में भी बसा है छल ||२८||

सुबह हुई, कबूतर चहके, उधर गिरजे से घंटे की टन-टन,
आँख खुली, दो निर्विकार चेहरे मुड़े थे अपनी करवट,
जैसे कल की सब बात गई, चले फिर मुँह धोने अपने तट,
यह तो वन सा है, जहाँ सभी कल की भूले, खुश रहते आज ही में,
पर यह मानव-मन कल-आज में घिरा, करता सारा दिन खुद से ही अनबन,
सुबह हुई, कबूतर चहके, उधर गिरजे से घंटे की टन-टन ||२९||

रसोई में हुई खट-पट, कहती फिर होगा अब सामना,
निस्तब्ध बैठे निगल लेते निवाला, पी लेते अपनी भावना,
पहले मित्र बने, फिर अहम् भरे दरबान, अब तो मूक बने रहते हैं,
कोई आता दौड़ा-दौड़ा भरी दुपहरी, डांट लगा, कर जाता सब खंडन,
सुबह हुई, कबूतर चहके, उधर गिरजे से घंटे की टन-टन ||३०||

बच्चों की चिल्लम-चिल्ली, उलझाती यूँ ही कुछ बातों में,
वे तो हैं मन के सच्चे, उन्हें क्या पता जो गुज़री बीती रातों में,
कभी उन्हें सुलाते सो जाते, कभी संत्री बन इतिहास कुरेदते,
सांझ ढले जब बच्चे जाते, फिर सोचते कैसे दें संधि का निमंत्रण,
सुबह हुई, कबूतर चहके, उधर गिरजे से घंटे की टन-टन ||३१||

अनिर्णीत से ठहरे हम, घुस जाते एक रजाई के दो कोनों में,
पलट दीवारों को देखते, सो जाते नाक बजाते दोनों के,
अक्सर नहीं हो पाया कि कुछ कह लेते मन की सोने से पहले,
रात ऐसे ही बीत गई, हम उनींदे उठे खींच कर अपना तन,
सुबह हुई, कबूतर चहके, उधर गिरजे से घंटे की टन-टन ||३२||

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