कत की माई बापु कत केरा किदू थावहु हम आए-शब्द -गुरु नानक देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Nanak Dev Ji

कत की माई बापु कत केरा किदू थावहु हम आए-शब्द -गुरु नानक देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Nanak Dev Ji

कत की माई बापु कत केरा किदू थावहु हम आए ॥
अगनि बि्मब जल भीतरि निपजे काहे कमि उपाए ॥१॥
मेरे साहिबा कउणु जाणै गुण तेरे ॥
कहे न जानी अउगण मेरे ॥१॥ रहाउ ॥
केते रुख बिरख हम चीने केते पसू उपाए ॥
केते नाग कुली महि आए केते पंख उडाए ॥२॥
हट पटण बिज मंदर भंनै करि चोरी घरि आवै ॥
अगहु देखै पिछहु देखै तुझ ते कहा छपावै ॥३॥
तट तीरथ हम नव खंड देखे हट पटण बाजारा ॥
लै कै तकड़ी तोलणि लागा घट ही महि वणजारा ॥४॥
जेता समुंदु सागरु नीरि भरिआ तेते अउगण हमारे ॥
दइआ करहु किछु मिहर उपावहु डुबदे पथर तारे ॥५॥
जीअड़ा अगनि बराबरि तपै भीतरि वगै काती ॥
प्रणवति नानकु हुकमु पछाणै सुखु होवै दिनु राती ॥६॥५॥१७॥(156)॥

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