कच्ची बस्ती -लावा -जावेद अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Javed Akhtar 

कच्ची बस्ती -लावा -जावेद अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Javed Akhtar

 

गलियाँ
और गलियों में गलियाँ
छोटे घर
नीचे दरवाज़े
टाट के पर्दे
मैली बदरंगी दीवारें
दीवारों से सर टकराती
कोई गाली
गलियों के सीने पर बहती
गंदी नाली
गलियों के माथे पर बहता
आवाज़ों का गंदा नाला

आवाज़ों की भीड़ बहुत है
इंसानों की भीड़ बहुत है
कड़वे और कसीले चेहरे
बदहाली के ज़हर से हैं ज़हरीले चेहरे
बीमारी से पीले चेहरे
मरते चेहरे
हारे चेहरे
बेबस और बेचारे चेहरे
सारे चेहरे

एक पहाड़ी कचरे की
और उस पर फिरते
आवारा कुत्तों से बच्चे
अपना बचपन ढ़ूँढ रहे हैं

दिन ढलता है
इस बस्ती में रहनेवाले
औरों की जन्नत को अपनी मेहनत देकर
अपने जहन्नम की जानिब
अब थके हुए
झुंझलाए हुए-से
लौट रहे हैं
एक गली में
ज़ंग लगे पीपे रक्खे हैं
कच्ची दारू महक रही है

आज सवेरे से
बस्ती में
क़त्लो-ख़ूँ का
चाकूज़नी का
कोई क़िस्सा नहीं हुआ है
ख़ैर
अभी तो शाम है
पूरी रात पड़ी है

यूँ लगता है
सारी बस्ती
जैसे इक दुखता फोड़ा है
यूँ लगता है
सारी बस्ती
जैसे है इक जलता कढ़ाव
यूँ लगता है
जैसे ख़ुदा नुक्कड़ पर बैठा
टूटे-फूटे इंसाँ
औने-पौने दामों
बेच रहा है।

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