कई बार इसका दामन भर दिया हुस्ने-दो-आलम से-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Faiz Ahmed Faiz

कई बार इसका दामन भर दिया हुस्ने-दो-आलम से-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Faiz Ahmed Faiz

कई बार इसका दामन भर दिया हुस्ने-दो-आलम से
मगर दिल है केः उसकी ख़ानःविरानी नहीं जाती

कई बार इसकी ख़ातिर ज़र्रे-ज़र्रे का जिगर चीरा
मगर ये चश्मे-हैराँ, जिसकी हैरानी नहीं जाती

नहीं जाती मताए’-लालो-गौहर की गराँयाबी
मताए’-ग़ैरतो-ईमाँ की अरज़ानी नहीं जाती

मिरी चश्मे-तन आसाँ को बसीरत मिल गई जब से
बहुत जानी हुई सूरत भी पहचानी नहीं जाती

सरे-ख़ुसरव से नाज़े-कजकुलाही छिन भी जाता है
कुलाहे-ख़ुसरवी से बू-ए-सुल्तानी नहीं जाती

बजुज़ दीवानगी वाँ और चारः ही कहो क्या है
जहाँ अक़्लो-ख़िरद की एक भी मानी नहीं जाती

 

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