कंक्रीट के जंगल झाड़-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

कंक्रीट के जंगल झाड़-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

 

धरती गीत सुनाए
ख़ुद लिखती तर्ज़ बनाती
बिन साज़ों के गाए।
सुन सकता है फूलों से
बंदा यदि चाहे।

आग का गोला चैबीसों घंटे
दहकते बोल अलावे।
सूरज तपता तप कर भी
रौशनियाँ बरतावे।

चंद्रमा की मधुर चाँदनी
क्या क्या रूप दिखाए।
प्रथमा का चाँद तनिक-सा
पूरा हो लोपित हो जाए।
तारों से बातें करके
लाखों कथा सुनाए।

सागर से लेकर जल कण
अंबर प्यास बुझाए
धरती दरकी देख पपीहा
जाने क्या कुछ गाए।
मेघदूत बन धरती पर
बादल वर्षा कर जाए।

कुदरत हर पल कण कण नृत्यरत
सुर संग ताल मिलाए।
कत्थक कथा सुनाते पत्ते
हमको समझ न आए।
बेकदरों के आँगन में
खुशबू कैसे आए।
कंक्रीट के जंगल-झाड़
आजकल शहर कहाए।

 

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