और वही तू?- राजेन्द्र केशवलाल शाह -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rajendra Keshavlal Shah

और वही तू?- राजेन्द्र केशवलाल शाह -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rajendra Keshavlal Shah

 

वह तू ही? जिसकी
हथेली तो नागरवेल के
खिले किसी नव पर्ण-सी
छू गयी थी शीतल लालिमा भरी?
और वही तू?
जो कँटीला देखू यह शतशत शूल से बींधता थूहर?

वह तू ही? जिसकी
वाणी में संगीतकिन्नरी का मैंने
आनन्द लिया था (गुनगुनाता बहा ध्वनि
तरंग आवृत्त अनन्त शान्ति में)?
और वही तू-
जिसके गरजते मौन ने निखिल सकल को कोलाहल से व्यग्र किया?

वह तू ही? जिसकी
आँखें सुधा बरसाती पूर्णचन्द्र की
अँधेरे को भी मिली जिसकी शुभ्रता,
समष्टि की अन्तर गूढ़ संमुद्रा?
और वही तू
जो विद्युत-से अशान्त भ्रमण में करे सबकुछ भस्मसात्?

रूपान्तर : सुल्तान अहमद

 

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