और फिर एक दिन यूँ ख़िज़ाँ आ गई-कविता -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz

और फिर एक दिन यूँ ख़िज़ाँ आ गई-कविता -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz

और फिर इक दिन यूं ख़िज़ां आ गई
आबनूसी तनों के बरहना शजर
सरनिगूं सफ़-ब-सफ़ पेशे-दीवारो-दर
और चारों तरफ़ इनके बिख़रे हुए
ज़रद पत्ते दिलों के सरे-रहगुज़र
जिसने चाहा वो गुज़रा इनहें रौंदकर
और किसी ने ज़रा-सी फ़ुग़ां भी न की
इनकी शाख़ों से ख़वाबो ख़यालों के सब नग़मागर
जिनकी आवाज़ गरदन का फन्दा बनी
जिससे जिस दम वो ना-आशना हो गये
आप ही आप सब ख़ाक में आ गिरे
और सैयाद ने ज़ह कमां भी न की
ऐ ख़ुदा-ए-बहारां ज़रा रहम कर
सारी मुरदा रगों को नुमू बख़श दे
सारे तिशना दिलों को लहू बख़श दे
कोई इक पेड़ फिर लहलहाने लगे
कोई इक नग़मागर चहचहाने लगे

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