ओ मेरे प्यार के अजेय बोध -आवाज़ों के घेरे -दुष्यंत कुमार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dushyant Kumar

ओ मेरे प्यार के अजेय बोध -आवाज़ों के घेरे -दुष्यंत कुमार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dushyant Kumar

 

ओ मेरे प्यार के अजेय बोध !
सम्भव है मन के गहन गह्वरों में जागकर
तुने पुकारा हो मुझे
मैं न सुन पाया हूँ ;
-शायद मैं उस वक़्त
अपने बच्चों के कुम्हलाये चेहरों पर
दिन उगाने के लिए
उन्हें अक्षर-बोध करा रहा हूँ
-या आफ़िस की फ़ाइल में डूबा हुआ
इत्तिफ़ाक की भूलों पर
सम्भावनाओं का लेप चढ़ा रहा हूँ
-या अपनी पत्नी के प्यार की प्रतीक
चाय पी रहा हूँ !

ऐसा ही होगा
ओ मेरे प्यार के अजेय बोध,
ऐसा ही हो सकता है
क्योंकि यही क्रम मेरा जीवन है, चर्या है
वरना
मैं तुम्हारी आवाज़ नहीं
आहट भी सुन लेता था
कोलाहलों में भी जब हवा महकती थी
तो मुझे मालूम हो जाता था
कि चम्पा के पास कहीं मेरी प्रतीक्षा है ।
जब तारे चमकते थे
तो मैं समझ लेता था कि आज नींद
व्योम में आँखमिचौनी खेलेगी
और यह कि मुझे तुम्हारे पास होना चाहिए ।

ओ मेरे प्यार के अजेय बोध,
शायद ऐसा ही हो कि मेरा एहसास मर गया हो
क्योंकि मैंने क़लम उठाकर रख दी है
और अब तुम आओ या हवा
आहट नहीं होती,
बड़े-बड़े तूफ़ान दुनिया में आते हैं
मेरे द्वार पर सनसनाहट नहीं होती
… और मुझे लगता है
अब मैं सुखी हूँ-
ये चंद बच्चे, बीवी
ये थोड़ी-सी तनख्वाह
मेरी परिधि है जिसमें जीना है
यही तो मैं हूँ
इससे आगे और कुछ होने से क्या?

…जीवन का ज्ञान है सिर्फ़ जीना मेरे लिए
इससे विराट चेतना की अनुभूति अकारथ है
हल होती हुई मुश्किलें
खामखा और उलझ जाती हैं
और ये साधारण-सा जीना भी नहीं जिया जाता है
मित्र लोग कहते हैं
मेरा मन प्राप्य चेतना की कड़ुवाहट को
पी नहीं सका,
उद्धत अभिमान उसे उगल नहीं सका
और मैं अनिश्चय की स्थिति में
हारा,
उद्विग्न हुआ,
टूट गया;
शायद ये सब सच हो है।

पर मेरे प्यार के अजेय बोध,
अब इस परिस्थिति ने नया गुल खिलाया है
आक्रामक तुझे नहीं मन मुझे बनाया है
अब मेरी पलकों में स्वप्न-शिशु नहीं रोते
(यानी अब तेरे आक्रमण नहीं होते)
अब तेरे दंशन को उतनी गहराई से
कभी नहीं जीता हूँ
अब तू नहीं
मैं तेरी आत्मा को पीता हूँ
तेरे विवेक को सोखता हूँ
तुमको खाता हूँ
क्योंकि मैं बुभुक्षित हूँ,
भूखा हूँ
ओ मेरे प्यार के अजेय बोध !

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