ओ मूर्त्ति !- चक्रांत शिला अज्ञेय- सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन “अज्ञेय”-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya,

ओ मूर्त्ति !- चक्रांत शिला अज्ञेय- सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन “अज्ञेय”-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya,

ओ मूर्त्ति!
वासनाओं के विलय,
अदम आकांक्षा के विश्राम!
वस्तु-तत्त्व के बंधन से छुटकारे के
ओ शिलाभूत संकेत,
ओ आत्म-साक्षय के मुकुर,
प्रतीकों के निहितार्थ!
सत्ता-करुणा, युगनद्ध!
ओ मंत्रों के शक्ति-स्रोत,
साधनाके फल के उत्सर्ग,
ओ उद्गतियों के आयाम!

ओ निश्छाय, अरूप
अप्रतिम प्रतिमा,
ओ निःश्रेयस‍
स्वयंसिद्ध!

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