ओ मसीहा-भूरी-भूरी खाक-धूल -गजानन माधव मुक्तिबोध-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gajanan Madhav Muktibodh 

ओ मसीहा-भूरी-भूरी खाक-धूल -गजानन माधव मुक्तिबोध-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gajanan Madhav Muktibodh

ओ मसीहा !!
काल-गिरि-शिखर बैठे
तुम !!
पलकों में रमे विश्व-स्वप्नों की
विस्तार-दृश्यों की
सांन्धय-स्वर्ण छाया ने
बदरंग घुमावदार
सियाह तकलीफ़देह
यथार्थ को, रंग दिया !!
और हमारे लिए
तुम्हारा वह तो रंग-स्वप्न-वैभव हाय
पाप-भार बन गया
मात्र ज्यामिति का
रेखाकृति-समस्या-रूप !!
अजीब सरदर्द
इतिहास-स्वप्न
विश्व-दृश्य-रंगों ने
भयानक ऊँचाई व
निचाई के
उतार-चढ़ाव भरे
खाई-खड्डवाले इस गुंजान प्रदेश को
मनोहर बना दिया !!
सुन्दर तुम्हारे लिए
अरे हम ‘हम’ होते हुए भी
दम-खम होते हुए भी तुमसे लड़ना ही नहीं लड़ पड़ना है !!
इसलिए कि
तुम्हारा विश्व-स्वप्न
काल-दृश्य संध्या-सी विशाल
झांक मारता है
उषा-सा चमचमाता है
फ़ज़ूल गुलाल का अंचल पसारता
बदरंग यथार्थ पर !!

बदरंग यथार्थ
विद्रूप अर्थ
आ, छाती में जाग
तू भी सही है
पिता ने पाला
पर तूने पोसा है तुझी को पाया है
ज़हरीली नीली इस स्याही से
चेहरा यह धोया है !!
पूर्णता के स्वप्न की विशालतम मिथ्या ने
अपूर्ण को, फटे को, जीर्ण को
अपमानित भी खूब किया है की
भयानक उभारा है

मनोहर तुम्हें ज़रूर
दीखता होगा यह विश्व,
सांध्य मेघों में बैठे तुम
लेकिन मसीहा ओ,
पेचीदा चक्करदार हमारे इस दर्रे को
हमें पार करना है
हाँफते हुए चढ़ना है चढ़ान
उतार पार करना है !!
बिल्कुल ही अनिश्चित कि
हम मरेंगे नहीं
कि हमारी देह
निचाई के खड्डे में पड़ी हुई
गिद्ध नही खायेगा ।

फिर भी हम
डरते नहीं हमारी इस पीढ़ी के
घोर यथार्थ से,
तुम्हारे खयालों से
लेकिन खूब डरते हैं ।
बहुत बुरा लगता है कि
तुमसे उपजकर ही
ओ मसीहा
तुमने अपने पापों का भार
हमारी ही पीठ पर उतारा है ।
यही विरासत है,
ओ मसीहा
तुम्हारे इस ऋण को
चुकाना असम्भव !!
इसीलिए नमन है !!
चला मैं,
अब तुम
मुझे न अपने कन्धों पर
उठाकर बालक-सा बैठाकर
अपनी दिशा में न
ले जा सकोगे यह
निश्चित ही समझो अब !!

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