ऐ हबीबे-अम्बरदस्त-ज़िन्दां-नामा-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Faiz Ahmed Faiz

ऐ हबीबे-अम्बरदस्त-ज़िन्दां-नामा-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Faiz Ahmed Faiz

(एक अजनबी ख़ातून के नाम ख़ुशबू का तोहफ़ा वसूल होने पर)

किसी के दस्ते-इनायत ने कुंजे-ज़िन्दां में
किया है आज अजब दिलनवाज़ बन्दोबस्त
महक रही है फ़ज़ा ज़ुल्फ़े-यार की सूरत
हवा है गरमी-ए-ख़ुशबू से इस तरह सरमस्त
अबी अभी गुज़रा है कोयी गुलबदन गोया
कहीं करीब से, गेसू-ब-दोश गुंचा-ब-दस्त
लिये है बू-ए-रफ़ाकत अगर हवा-ए-चमन
तो लाख पहरे बिठायें कफ़स पे ज़ुलम-परस्त
हमेशा सबज़ रहेगी वो शाख़े-मेहरो-वफ़ा
कि जिसके साथ बंधी है दिलों की फ़तह-ओ-शिकस्त

ये शे’रे-हाफ़िजे-शीराज़, ऐ सबा, कहना,
मिले जो तुझसे कहीं वो हबीबे-अम्बरदस्त
“ख़लल पिज़ीर बुवद हर बिना कि मी बीनी
बजुज़ बिना-ए-महब्बत कि ख़ाली अज़ ख़लल अस्त”

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