ऐ वतन, ऐ वतन-सरे-वादी-ए-सीना -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz 

ऐ वतन, ऐ वतन-सरे-वादी-ए-सीना -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz

तेरे पैग़ाम पर, तेरे पैग़ाम पर, ऐ वतन, ऐ वतन
आ गये हम फ़िदा हो तिरे नाम पर
तेरे पैग़ाम पर, ऐ वतन, ऐ वतन

नज़र क्या दें कि हम मालवाले नहीं
आन वाले हैं इकबाल वाले नहीं
हां, यह जां है कि सुख जिसने देखा नहीं
या ये तन जिस पे कपड़े का टुकड़ा नहीं
अपनी दौलत यही, अपना धन है यही
अपना जो कुछ भी है, ऐ वतन, है यही
वार देंगे यह सब कुछ तिरे नाम पर
तेरी ललकार पर, तेरे पैग़ाम पर
तेरे पैग़ाम पर, ऐ वतन, ऐ वतन
हम लुटा देंगे जानें तिरे नाम पर

तेरे ग़द्दार ग़ैरत से मूंह मोड़कर
आज फिर ऐरों-गैरों से सर-जोड़कर
तेरी इज़्ज़त का भाव लगाने चले
तेरी असमत का सौदा चुकाने चले
दम में दम है तो यह करने देंगे न हम
चाल उनकी कोई चलने देंगे न हम
तुझको बिकने न देंगे किसी दाम पर
हम लुटा देंगे जानें तिरे नाम पर
सर कटा देंगे हम तेरे पैग़ाम पर
तेरे पैग़ाम पर, ऐ वतन, ऐ वतन

आ गये हम फ़िदा हो तिरे नाम पर
तेरे पैग़ाम पर, ऐ वतन, ऐ वतन

नज़र क्या दें कि हम मालवाले नहीं
आन वाले हैं इकबाल वाले नहीं
हां, यह जां है कि सुख जिसने देखा नहीं
या ये तन जिस पे कपड़े का टुकड़ा नहीं
अपनी दौलत यही, अपना धन है यही
अपना जो कुछ भी है, ऐ वतन, है यही
वार देंगे यह सब कुछ तिरे नाम पर
तेरी ललकार पर, तेरे पैग़ाम पर
तेरे पैग़ाम पर, ऐ वतन, ऐ वतन
हम लुटा देंगे जानें तिरे नाम पर

तेरे ग़द्दार ग़ैरत से मूंह मोड़कर
आज फिर ऐरों-गैरों से सर-जोड़कर
तेरी इज़्ज़त का भाव लगाने चले
तेरी असमत का सौदा चुकाने चले
दम में दम है तो यह करने देंगे न हम
चाल उनकी कोई चलने देंगे न हम
तुझको बिकने न देंगे किसी दाम पर
हम लुटा देंगे जानें तिरे नाम पर
सर कटा देंगे हम तेरे पैग़ाम पर
तेरे पैग़ाम पर, ऐ वतन, ऐ वतन

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