ऐ बरतर अज़ ख़्यालो क़यासो गुमाने मा- कविता (धार्मिक)-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi 

ऐ बरतर अज़ ख़्यालो क़यासो गुमाने मा- कविता (धार्मिक)-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

यारब है तेरी जात को दोनों जहां में बरतरी।
है याद तेरे फज्ल को रस्में खलाइक परवरी।
दाइम है खासो आम पर लुत्फ़ो अता हिफ़्ज़ आवरी।
क्या उनसिया, क्या तायेरा, क्या वह्श, क्या जिन्नों परी।
पाले है सबको, हर जमा तेरा करम और यावरी।
तू खालिके अर्ज़ों समा, तू हाकिमे क़ुदरत नुमा।
है हुक्म तेरा जा बजा, ले अर्श ता तहतूस्सरा।
बरतर मुक़द्दस, जुलउला, बंदे तेरे शाहो गदा।
दुनियाओ दीं की या खुदा बरहक तुझी को है रवा।
फरमारबाई, हाकिमी, शाही, खुदाई, सरवरी।
क़ुदरत ने तेरी हर जमा लेकर जमीं ता आस्माँ।
क्या क्या बहारें की अयाँ, क्या क्या दिखाई खूबियाँ।
मर्गूब रंगआमेजियाँ, महबूब हुस्न आराइयाँ।
हक तेरी सनअत पै यहाँ हैं खत्म लारेबो गुमा।
रंगीनी-ओ, तर्राही, आं नक्काशी ओ, सूरत गरी।
तूने बनाये सब फ़लक पैदा किये हूरो-मलक।
इंसा सबीहो पुर नमक, हैवां अजायब यक बयक।
हर जी तजल्ली और झमक बेइंतिहा नूर और चमक।
कहती है दानिश उनको तक, है यह भी क़ुदरत की झलक।
चमके हैं जिससे इस कदर खुर्शीदी माहो-मुश्तरी।
तू कादिरो-सुबहान है, अकदस मुअल्ला शान है।
ख़ालिक़ है और रहमान है रज़्जाक और मन्नान है।
तेरा करम हर आन है, एहसान बेपायान है।
हमको यही शायान है, जब तक बदन मे जान है।
हर आन में लावें बजा शुकरानओ फरमाबरी।
जो जो है तेरी कुदरतें क्या क्या बयां उनका करें।
आती नहीं कुछ फह्म में, जूज़ यह कि उनको तक रहें।
क्या क्या बनाई नैमतें, क्या क्या बनाई रहमतें।
कब शुक्र उनका कर सकें लेकिन यही हर दम कहें।
यारब तेरा फज़्लो करम लुत्फ़ो-इनायत गस्तरी।
है तू ही रब्बुल आलमी, और तू ही खैरूर्राहिमी।
यकताई है तेरे तई, हमसर तेरा कोई नहीं।
ले आस्माँ से ता जमीं, हैं सब इबादो ताबई।
है यह ‘नज़ीर’ इस्यांकरी जाने है बा सिद्कोयकी।
होगी तेरे ही फज्ल से हर जा मेरी खोटी खरी।

Leave a Reply