ऐ दिले-बेताब, ठहर-दस्ते सबा -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Faiz Ahmed Faiz

ऐ दिले-बेताब, ठहर-दस्ते सबा -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Faiz Ahmed Faiz

तीरगी है कि उंमडती ही चली आती है
शब की रग-रग से लहू फूट रहा हो जैसे
चल रही है कुछ इस अन्दाज़ से नबज़े-हस्ती
दोनों आलम का नशा टूट रहा हो जैसे

रात का गरम लहू और भी बह जाने दो
यही तारीकी तो है ग़ाज़ए-रुख़सारे-सहर
सुबह होने ही को है, ऐ दिले-बेताब, ठहर

अभी ज़ंजीर छनकती है पसे-परदए-साज़
मुतलक-उल-हुक्म है शीराज़ए-असबाब अभी
साग़रे-नाब में आंसू भी ढलक जाते हैं
लरज़िशे-पा में है पाबन्दी-ए-आदाब अभी

अपने दीवानों को दीवाना तो बन लेने दो
अपने मयख़ानों को मयख़ाना तो बन लेने दो
जल्द ये सतवते-असबाब भी उठ जायेगी
ये गरांबारी-ए-आदाब भी उठ जायेगी
ख़्वाह ज़ंजीर छनकती ही, छनकती ही रहे

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