एसोसिएशन-तार सप्तक -गिरिजा कुमार माथुर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Girija Kumar Mathur 

एसोसिएशन-तार सप्तक -गिरिजा कुमार माथुर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Girija Kumar Mathur

कुछ सुनसान दिनों को,
और चाँदनी से ठण्डी-ठण्डी रातों को,
पत्रों की दुनिया से भी हम दूर हुए थे;
आज तुम्हारा सूना-सा सन्देश मिला है,
प्यार दूर का ।
मान-गर्व के दो दिन अभी बिताये मैंने,
गीतों के उस मेले में ।
मेल मुझे ले कर उड़ती जाती थी,
रंग-भरे पानी-से चलते उन डिब्बों की एक कोच पर,
सनसन-सनसन वायु वेग से,
घनी वन्य नदियों से छन में पार उतर कर,
पीछे छोड़ नगर-ग्रामों को
कितनी ही पर्वत-माला की घूमों में से।
एक सीध में बनी, खिड़कियों में से हो कर,
कमरों का विद्युत्-प्रकाश-बाहर पड़ता था,
तेज़ी से चलती लम्बी लकीर बन-बन कर,
सून-सून करते उन पीछे उड़ते मैदानों में;
हल्के चाँद-भरे जो अनजानी दूरी तक,
वन-फूलों की सोंधी-सी सुगन्ध में डूबे।
लेकिन मैं जाने कितने पीछे चलता था,
एक बरस पहिले की इन ठण्डी आंखों में-
इसी तरह का वह रंगीन दूसरा दर्जा
वायू-वेग से चलता जाता ।
जब दूरी तक फैले-फैले,
वन, पर्वत, मैदान उतर कर,
लम्बी, लम्बी-सी तेज़ी से-
तुम उस रेशम-सेज-कोच पर,
देख रहीं उड़ती पहाड़ियां खिड़की में से
एक हाथ पर चिबुक टिकाये;
साथ-साथ ही,
वह पहले पियार की यात्रा ।
आज दूर हो,
प्राणों से, तन से पीड़ित हो—
मेरी सूनी-सी आँखें हैं,
सूना-सा मेरा घर, आँगन ।
चहल-पहल है नगर बीच,
दूर तुम्हारे देश यही सब होता होगा-
यही धूप, उजली कुँआर की यहीं धूप भी
पंछी, वायु, यहीं नम, बादल ।
सून-सून करते मैदानों में से हो कर,
मेल जायगी, निज लम्बी-लम्बी तेज़ी से
प्रतिदिन की ही भांति आज भी ।

Leave a Reply