एक है ज़मीन तो सम्त क्या हदूद क्या-ग़ज़लें(तन्हा सफ़र की रात)-जाँ निसार अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Jaan Nisar Akhtar

एक है ज़मीन तो सम्त क्या हदूद क्या-ग़ज़लें(तन्हा सफ़र की रात)-जाँ निसार अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Jaan Nisar Akhtar

एक है ज़मीन तो सम्त क्या हदूद क्या
रोशनी जहाँ भी हो, रोशनी का साथ दो

ख़ुद जुनूने-इश्क़ भी अब जुनूँ नहीं रहा
हर जुनूँ के सामने आगही का साथ दो

हर ख़याल-ओ-ख़्वाब है कल की जन्नतें लिए
हर ख़याल -ओ-ख़्वाब की ताज़गी का साथ दो

छा रही है हर तरफ़ ज़ुल्मतें तो ग़म नहीं
रूह में खिली हुई चाँदनी का साथ दो

क्या बुतों का वास्ता, क्या ख़ुदा का वास्ता
आदमी के वास्ते आदमी का साथ दो

Leave a Reply