एक सिक्के की आस में-कविता-प्रफुल्ल सिंह “बेचैन कलम” -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Praful Singh “Bechain Kalam”

एक सिक्के की आस में-कविता-प्रफुल्ल सिंह “बेचैन कलम” -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Praful Singh “Bechain Kalam”

 

एक सिक्के की आस में
कब से भटक रहा है वो
सिग्नल की बत्ती लाल देख
गाडियों पे है झपट रहा वो
मांग रहा हर एक से सिक्का
लगाये हुए वो आस…

कुछ उससे नज़रे चुरा रहे
कुछ अपनी मजबूरी जता रहे
आसानी से मिलता कहाँ सिक्का
जिसकी उसे तलाश
यह एहसास उसे भी है
फिर भी कर रहा प्रयास..

जा रहा हर एक के पास
अपनी मज़बूरी लिए हुए
पसीज जा रहा जिनका सीना
वो दे देते उसे सिक्का अपना
कुछ असंवेदनहीन ऐसे भी है
जो बेचारे को डांट लगाते
चोर-चकार की संज्ञा देकर
दूर से ही उसे भगाते…

उस बदनसीब की नसीब कहाँ
की कोई उसको प्यार दे
उसको तो इतना भी न पता
मातृ छाया होती है क्या…

माँ के प्यार को तरसा
तरस रहा है सिक्को को
सिक्को से ही उसे रोटी है मिलनी
और सिक्को से प्यार..

उसकी ये दुर्दशा देख
उठते कई सवाल
उसकी बेवसी क्या है ऐसी
जो फैला रहा वो हाथ
होने थी जिस हाथ किताबें
क्यों उनको सिक्को की दरकार…

बच्चे ही भविष्य हमारा
हम सब ये जानते है
फिर भविष्य का वर्तमान ऐसा
क्यों इसे ऐसे स्वीकारते हैं
ये कैसी है समस्या
जिसे हम, सुलझा नहीं पाए..!

 

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