एक शक्स को गज़ल बनते देखा है मैंने-उमेश दाधीच -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Umesh Dadhich

एक शक्स को गज़ल बनते देखा है मैंने-उमेश दाधीच -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Umesh Dadhich

एक शक्स को गज़ल बनते देखा है मैंने
जख्म को लब्जों में बदलते देखा है मैंने

खामोश लबों का शोर सुनाना था शायद
उस दर्द को स्याही में ढलते देखा है मैंने

हिज्र में जलना कोई पुछे उसके साये से
रूह को कागज़ पर पिघलते देखा है मैंने

लड़खड़ाता रहा है जो हाथों में उमर भर
वो इश्क़ किताबों में संभलते देखा है मैंने

ख्वाब लिये तमाम रातें जागी दोनों आंखें
वो ही चेहरा अश्कों में बहते देखा है मैंने ।

Leave a Reply