एक प्रयोग-बोलने दो चीड़ को -नरेश मेहता-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Naresh Mehta

एक प्रयोग-बोलने दो चीड़ को -नरेश मेहता-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Naresh Mehta

 

गरमा रही है जिन्दगी
धूप पीले कम्बलों में।
गुलाबी रंग
बेगमबेलिया–
हरे पत्तों की छतरियाँ तान
अगंधिम रंगझूमर
हवा में हिल
सिक रहा है।
बकरियों के कान वाली
कदलियाँ
हरे शीशों की तरह–
पत्तों की अनेकों पारदर्शी बाँह खोले

(ओवल ग्रीन वाली वर्दियाँ पहने जवानों की तरह कवायद में)

खड़ी साँसें ले रही हैं।
क्रीम-सी उजली
सिन्दूर गमलों की कतारों में
नये पानी नहायी
गुलदावली–
पथ बनाये मौन
गौरैया सरीखी लग रही है।
छोटे पाम
हरे फौवारे सरीखे
फुलझड़ी से छूट कर
हों जम गये।
पालियों की बाँह में
दौड़ती हैं शीत जल की लहरियाँ
छूने सूरजमुखी को
जिसने ओस भीगी पलक अपनी
रंगचिक-सी
धूप के इस समुद्री तट पर उठायीं हैं।
पेड़ के गाउन
हवा में सरसराते उड़ रहे हैं।
केवड़े की हरी तलवारें खड़ी इस धूप में
दे रहीं पहरा,
क्योंकि छोटे मोरपंखी
नाचने का कर रहे अभ्यास।
मोटी हिल रहीं हैं
नीमछाँहें।
लान
उजलाने लगा है ओस वाले दाँत चाँदी के
केतली की गरम भापों की तरह
धारियों में उड़, रहा है नील कुहरा
क्यारियों से।
साँझ होने तक
दिन के इस हजारे से
झरेगा धूप का गुनगुना पानी,
नहा लेती नहीं जब तक
फूल की हर पाँखुरी
जो कुँआरी।

१ दिसम्बर १९५० : प्रयाग

 

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