एक नग़मा करबला-ए-बेरूत के लिये-ग़ुब्बार-ए-अय्याम -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz

एक नग़मा करबला-ए-बेरूत के लिये-ग़ुब्बार-ए-अय्याम -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz

(बेरूत पर इसराईली हमले के वकत लिखी गई)

बेरूत निगारे-बज़्मे-जहां
बेरूत बदीले-बाग़े-जिनां

बच्चों की हंसती आंखों के
जो आईने चकनाचूर हुए
अब उनके सितारों की लौ से
इस शहर की रातें रौशन हैं

जो चेहरे लहू के ग़ाज़े की
ज़ीनत से सिवा पुरनूर हुए
अब उनकी दमक के परतव से
इस शहर की गलियां रौशन हैं
अब जगमग है अरज़े-लबनां

बेरूत निगारे-बज़्मे-जहां
बेरूत बदीले-बाग़े-जिनां

हर कुशता मकां हर इक खंडर
हम-पाया-ए-कसरे-दारा है
हर ग़ाज़ी रशके-इसकन्दर
हर दुख़तर कामते-लैला है
ये शहर अज़ल से कायम है
बेरूत दिले-अरज़े-लबनां

बेरूत निगारे-बज़्मे-जहां
बेरूत बदीले-बाग़े-जिनां

बेरूत, जून, १९८२

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