एक दिन भी जी मगर-लहर पुकारे -गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

एक दिन भी जी मगर-लहर पुकारे -गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

एक दिन भी जी मगर तू ताज बनकर जी,

अटल विश्वास बनकर जी;
अमर युग-गान बनकर जी !

आज तक तू समय के पदचिह्न-सा खुद को मिटाकर
कर रहा निर्माण जग-हित एक सुखमय स्वर्ग सुन्दर,
स्वार्थी दुनिया मगर बदला तुझे यह दे रही है–
भूलता युग-गीत तुझको ही सदा तुझसे निकलकर,
‘कल’ न बन तू ज़िन्दगी का “आज” बनकर जी,
अटल विश्वास बनकर जी !

जन्म से तू उड़ रहा निस्सीम इस नीले गगन पर,
किन्तु फिर भी छाँह मंज़िल की नहीं पड़ती नयन पर,
और जीवन-लक्ष्य पर पहुंचे बिना जो मिट गया तू-
जग हँसेगा खूब तेरे इस करुण असफल मरण पर,
ओ मनुज ! मत विहग बन आकाश बनकर जी,
अटल विश्वास बनकर जी !

एक युग से आरती पर तू चढ़ाता निज नयन ही
पर कभी पाषाण क्या ये पिघल पाये एक क्षण भी,
आज तेरी दीनता पर पड़ रहीं नज़रें जगत की,
भावना पर हँस रही प्रतिमा धवल, दीवार मठ की,
मत पुजारी बन स्वयं भगवान बनकर जी !
अमर युग-गान बनकर जी ।

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