एक और प्रसंग-जलते हुए वन का वसन्त-खण्ड तीन-दुष्यंत कुमार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dushyant Kumar

एक और प्रसंग-जलते हुए वन का वसन्त-खण्ड तीन-दुष्यंत कुमार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dushyant Kumar

आँखों में भरकर आकाश
और हृदय में उमंग,
काँपती उँगलियों में सहज थरथराती हुई
छोटी-सी पतंग,
मैंने–
शीश से ऊँची उठाकर
और ऊपर निहारकर,
विस्मय, आशंका और हर्ष की प्रतीति सहित
वायु की तरंगों पर छोड़ दी-अपंग ।

कोई आवाज़ कहीं नहीं हुई।
शांत रहा संध्या का कण्ठ !
धुएँ-सा बदलता रहा आसमान रंग ।

मेरी पतंग-
मुझे नीचे से ऊपर-
और ऊपर…को जाती हुई-
पर खोले
चील से बगुला
और बगुले से छोटी-सी चिड़िया की भाँति लगी,
मुझमें उत्सुकता के साथ सहज पीड़ा की
हल्की अनुभूति जगी-
“जाने क्या होगा” ?

किंतु आह !
क्षण भर के बाद ।
वह चिड़िया और उसका पूरा परिवेश
(नभ का पूर्वी प्रदेश)
साँवली लकीरों के साँपों ने घेर लिया ।
कट गई पतंग ।
अंधकार का अजगर लील गया
एक-एक पंख ।
बाँहें फैलाकर आकाश
उसे ग्रहण नहीं कर पाया ।
बिखर गया काला-सा गाढ़ा अवसाद-निस्तरंग ।

फटी-फटी आँखों से
कटी हुई डोरी का एक छोर पकड़े
हुआ कहीं और एक स्तर पर
एक स्वप्न-भंग ।
[कितना विचित्र साम्य रखता है
जीवन
और गगन से पतंग का प्रसंग ।]

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