एक आत्म-वक्तव्य -तार सप्तक -गजानन माधव मुक्तिबोध-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gajanan Madhav Muktibodh 

एक आत्म-वक्तव्य -तार सप्तक -गजानन माधव मुक्तिबोध-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gajanan Madhav Muktibodh

 

“”‘और, जब
मेरा सिर दुखने लगता है,
धुंधले-धुंधले अकेले में, आलोचन-शील
अपने में से उठे धुएं की ही चक्करदार
सीढ़ियों पर चढ़ने लगता हूँ ।

और हर सीढ़ी पर लुढ़की पड़ी एक-एक देह,
आलोचन-हत मेरे पुराने व्यक्तित्व,
भूतपूर्व, भुगते हुए, अनगिनत ‘मैं’ ।
उनके शवों, अर्ध-शवों पर ही रखकर
निज सर्व-स्पृश पैर,
मेरे साथ चलने लगता भावी-कर-बद्ध
मेरा वर्तमान ।

किन्तु पुनः-पुनः
उन्हीं सीढियों पर नए-नए आलोचक नेत्र,
(तेज नाकवाले तमतमाए-से मित्र)
खूब काट-छाँट और गहरी छील-छाल
रंदों और बसूलों से मेरी देख-भाल,
मेरा अभिनव संशोधन अविरत
क्रमागत ।

अभी तक
सिर में जो तड़फड़ाता रहा ब्रह्माण्ड,
लड़खड़ाती दुनिया का भूरा मानचित्र
चमकता है दर्द भरे अँधेरे में वह
क्रमागत कांड ।
उसमें नये-नये सवालों की झखमार;
थके हुए, गिरते-पड़ते, बढ़ने का दौर;
मार-काट करती हुई सदियों की चीख;
मुठभेड़ करते हुए स्वार्थों के बीच
भोले-भाले लोगों के माथे पर घाव ।
कुचले हुए इरादों के बाकी बचे धड़
अधकटे पैरों से ही लात मारकर
अपने जैसे दूसरों के लिए
सब करते हैं दरवाज़े बंद-
उलटे दिल दिमाग़ों में गुस्से की धुंध ।
अँधियाली गलियों में घूमता है,
तड़के ही, रोज़
कोई मौत का पठान
मांगता है ज़िंदगी जीने का ब्याज;
अनजाना क़र्ज़
मांगता है चुकारे में, प्राणों का मांस ।
हताहत स्वयं को ही दर्दीली रात-
जोड़-तोड़ करती हुई गहरी काट-छाँट;
रोज नई आफ़त, कोई नई वारदात ।
पूरे नहीं हो सके हैं मानवीय योग,
हर एक के पास अपने-अपने व गुप्त रोग,
(परेशान चिंतकों की दार्शनिक झींख)
उजली-उजली सफ़ेदी में
कोखों की शर्म;
(अधबने समाधानों)
भ्रूणों का, अँधेरे में,क्रमागत जन्म;
सृजन-मात्र उद्गार-धर्म !
सत्ताग्रही, अर्थाकांक्षी
शक्ति के कृत्य,
और मेरे प्राणों में
सत्यों के भयानक
केवल व्यंग-नृत्य,
व्यंग-नृत्य !!

उसी विश्व-यात्रा में, चट्टानों बीच,
किसी झुकी संवलायी सांझ
मुझे मिला
(हृदय-प्रकाश-सा) अकेले में
बिजली से जगमगाता घर,
जिसके इर्द-गिर्द
कुच्छ अंधियाले पेड़
मानो सधे हुए, घने
बहुत घने, बड़े-बड़े दर्द ।
अचानक घर में से निकल आया एक
चौड़े माथे वाला, भोला, प्रतिभा का पुत्र
दुबला बाल-मुख ।
पहचाना मुझे, और हंस चुप-चाप,
मेरे ख़ाली हाथों में रख गया
दीप्तिमान रत्न-
भयानक वीरानों में घूम कर
खोजा था जो सार-सत्य
आत्म-धन
छटपटाती किरनों का पारदर्शी कवार्ट्ज़,
किरनें कि आलोचनाशील, धारदार
उपादान
जिन की तेज़ नोकों से अकस्मात्
मेरी काट-छांट, छील-छाल
लगातार ।
इसी लिए, मेरी मूर्ति
अनबनी अधबनी अभी तक”

जिसे लिये कहीं जाऊं, सदा ही का प्रश्न ।
अपने इस अधबने-पने का ग़रीब
यह दृश्य
पा न जाय, सभायों में, कहीं तिरस्कार,
अर्थहीन समयों के द्वारा कहीं वह
निकाला न जाय ।
इसी लिए, मुझे प्रिय अपना अन्धकार,
गठरी में छिपा रखा निजी रेडियम,
सिर पर, टोकरी में
छिपाया है मैंने कोई यीशु,
अपना कोई शिशु ।

परन्तु, मैं किसी पेड़-पीछे-से झोंक
लाख-लाख आँखों से देखता हूँ दृश्य,
पूरे बने हुओं ही के ठाठदार अक्स,
ऐसा कुछ ठाठ-
मुझे गहरी उचाट,
लगता है वे मेरे राष्ट्र के नहीं हैँ।
उचटता ही रहता है दिल,
नहीं ठहरता कहीं,
ज़रा भी ।
यही मेरी बुनियादी ख़राबी ।

और, अब नये-नये मेरे मित्र-गण
मेरे पीछे आये हुए युवा-बाल-जन,
धरित्री के धन,
खोजता हूँ उन में ही
छटपटाती हुई मेरी छांह,
क्या कहीं वहाँ मेरा रूपक-उपमान,
छिपी हुई कहीं कोई गहरी पहचान,
समशील, समधर्मा कहीं कोई है ?

अच्छा है कि अटाले में फेंका गया मैं
एक प्रेम-पत्र,
किताबों में डाल, बन्द कर दी गई अक़्ल,
काली-काली गलियों में
फिरती हुई आदमी की शक्ल,
अच्छा है कि अँधेरे में इलाक़ा-बदर
मैं हूँ जवाबी ग़दर,
जिससे कि और ज़्यादा तैयारियां कर
आज नहीं कल फूट पड़ूंगा ज़रूर,
ज़रूर !

असंख्यक इत्यादि-जनों का मैं भाग
इसी लिए, अनदिखे,
सुलगाता धीरे से आग,
जिस के प्रकाश में, तंबियाये चेहरों पर आप
संवेदित ज्ञान की कांपती ही
उठती है भाप चुप-चाप”‘
सच्चा है जहाँ असन्तोष,
मेरा वहाँ परिपोष ।
वहाँ दिवालों पर टंगते हैं भिन्न मान-चित्र,
चिनगियां बरसाते
लगातार विचारों के सत्र,
मेरे पात्र-चरित्रों की
आँखों की अंगारी ज्योति
ललक कर पढ़ती है मेरा प्रेम-पत्र ।
काँपता है वर्ग-मूल-अर्थ-भरा
त्रैराशिकी कोई स्मित स्निग्ध।
यथार्थों से चला हुआ
स्वर्गों तक पहुंचता है,
गणितों का किरणीला सेतु,
पृथ्वी के हेतु ।
लेकिन, हाँ, उसी के लिए दिन-रात
नये-नये रन्दों और बसूलों से
लगातार-लगातार
मेरी काट-छांट
उन की छील-छाल अनिवार ।
ऐसी उन भयानक क्रियाओं में रम
कटे-पिटे चेहरों के दाग़दार हम
बनाते हैं अपना कोई अलग दिक्-काल,
पृथक् आत्म-देश-
दृष्टि, आवेश !
क्षमा करें, अन्य-मति
अन्य-मुख मेरे परिजन !!

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