एकाध-बार-तूस की आग-भवानी प्रसाद मिश्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhawani Prasad Mishra

एकाध-बार-तूस की आग-भवानी प्रसाद मिश्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhawani Prasad Mishra

 

जैसे रोम खड़े हो जाते हैं
सुख में या भय में
बड़े हो जाते हैं वैसे
कई बार
अनसुने हल्के स्वर
अन बोले शब्द
अनाहत ध्वनियां
अनुभव की शुन्यता में

शायद कई-वार कहना
ग़लत है
बदल कर कहता हूँ
एक
आध
बार !

 

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